सियासी बदला है राहुल गांधी से पूछताछ वाली पीड़ा

राहुल गांधी से तीन दिन तक लगातार मैराथन पूछताछ के बाद भी प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी के सवाल खत्म नहीं हुए हैं। दबाव किस पर है? राहुल गांधी पर निश्चित रूप से है कि हर दिन 10 घंटे से ज्यादा की पूछताछ का टार्चर खत्म हो। लेकिन, ईडी पर भी भारी दबाव है कि उसके हाथ ऐसा कुछ लगे जिससे कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष को मनी लॉन्ड्रिंग का जिम्मेदार ठहराया जा सके। सर गंगाराम अस्पताल में इलाजरत यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी से अभी पूछताछ होना बाकी है। ईडी की ओर से पूछताछ के लिए 8 जून की तारीख बढ़कर अब 23 जून हो चुकी है। मतलब यह कि अभी कांग्रेस के लिए परेशानी वाला एक दौर खत्म भी नहीं हुआ है और हफ्ते भर में एक और ऐसा ही दौर इंतजार कर रहा है।

कांग्रेस सत्याग्रह कर रही है। गांधी परिवार के साथ खड़ी है। वहीं बीजेपी इसे भ्रष्टाचार के लिए सत्याग्रह बताकर कांग्रेस पर हमला बोल रही है। राजनीतिक घात-प्रतिघात तो परंपरा है। मगर, मीडिया ने गांधी परिवार को नेशनल हेराल्ड केस में पहले से ही भ्रष्ट साबित कर दिया है। वह कांग्रेस कार्यकर्ताओं के धरना-प्रदर्शन को भी जांच एजेंसियों पर दबाव बनाने की कोशिश बता रहा है। मतलब यह कि मीडिया ही की तरह कांग्रेस कार्यकर्ता भी मान लें कि सोनिया-राहुल नेशनल हेराल्ड केस में भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। सवाल उठाए जा रहे हैं कि जब मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने एसआईटी का सामना किया और बीजेपी ने कोई प्रतिरोध नहीं जताया तो केवल सांसद रहे राहुल गांधी के लिए कांग्रेस क्यों धरना-प्रदर्शन कर रही है?

 मगर, सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी एसआईटी जांच को भुला नहीं पाए हैं? क्या रात सवा बजे तक दो सत्रो में चार घंटों के अंतर पर 9 घंटों की पूछताछ को वे भूल नहीं सके हैं? क्या इसलिए राहुल गांधी से ईडी हर दिन 9 घंटे से ज्यादा और एक दिन नहीं, तीन-तीन दिन तक पूछताछ कर चुकी है? और, आगे भी क्या इसीलिए यह हरि अनंत कथा मालूम पड़ रही है? अगर ऐसा है तो सोनिया गांधी से 23 जून को ईडी की पूछताछ और भी भयावह होने वाली है। कांग्रेस को बदले की भावना का डर अनायास नहीं है। अमित शाह जेल में रहे, तब केंद्र में पी चिदंबरम गृहमंत्री थे। जब अमित शाह केंद्रीय गृहमंत्री बने तो पी चिदंबरम को जेल की हवा खानी पड़ी। इसमें भी उल्लेखनीय बात यह रही कि अमित शाह ने अगर 97 दिन जेलों में काटी, तो चिदंबरम को उससे पहले जेल से नहीं निकलने का पुख्ता इंतजाम भी किया। 

एक केस में बेल होने से पहले ही ईडी के सहारे दूसरे केस में जेल में रहने की व्यवस्था करा दी। अमित शाह के जेल में 97 दिन के मुकाबले पी चिदंबरम 106 दिन बाद जेल से निकले। अमित शाह पर सोहराबुद्दीन एनकाउंटर में लिप्त रहने, एनकाउंटर के सुपारी गैंग से मिलीभगत जैसे आरोप थे। जब उन्हें जमानत मिली तब भी शर्त यही थी कि वे गुजरात से बाहर महाराष्ट्र में रहेंगे, पासपोर्ट जब्त रहेगा और नियमित रूप से महाराष्ट्र में हाजिरी लगानी पड़ेगी। मुंबई में रहकर भी जब अमित शाह ने अदालत में मौजूद होने की आवश्यकता को लगातार नजरअंदाज किया तो जिन किसी जज ने इस पर टोकाटाकी की वे केस से हटते चले गये। यह भी संयोग था। ऐसे ही एक जज जस्टिस लोया ने अमित शाह को अदालत में सशरीर उपस्थित रहने पर जोर दिया, तो उनकी रहस्यमय परिस्थिति में मौत हो गई। इस घटना की जांच करने-कराने को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक बात पहुंची, लेकिन जांच से मना कर दिया गया।

बाद में इन सारे मामलों से अमित शाह बरी भी हो गये। इस दौरान उनका और उनकी पार्टी का सत्ता में रहना एक संयोग हो सकता है। संयोग देखिए चिदंबरम जेल गये, जज को मिला रिटायरमेंट के बाद बड़ा पद। मगर, पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम का उस वक्त जेल में जाना जब अमित शाह उस कुर्सी पर विराजमान हो चुके हैं जहां कभी चिदंबरम विराजमान हुआ करते थे, क्या महज संयोग था? आईएनएक्स मीडिया करप्शन केस में 21 अगस्त, 2019 को गिरफ्तार पी चिदंबरम को 22 अक्टूबर को जमानत मिलती है। लेकिन, उससे पहले ही ईडी 16 अक्टूबर को उन्हें एक अन्य मामले में गिरफ्तार कर लेती है जिसकी एफआईआर 15 मई 2017 को सीबीआई ने दर्ज कराई थी और आरोप था कि वित्तमंत्री रहते उन्होंने रिश्वत लेकर आईएनएक्स समूह के पक्ष में फैसले लिए थे। उल्लेखनीय बात यह भी है कि पी चिदंबरम की गिरफ्तारी की राह बनाने वाले जस्टिस सुनील गौड़ को सेवानिवृत्ति के तत्काल बाद 23 सितंबर को मनी लॉन्ड्रिंग के लिए अपीलीय न्यायाधिकरण यानी एटीपीएमएल का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया जाता है।

 इसे भी हम संयोग कह सकते हैं। इल्जाम साबित हो न हो, सजा तो मिलेगी-चाहे अमित शाह हों या पी चिदंबरम और नरेंद्र मोदी हों या सोनिया-राहुल- इन पर लगे इल्जाम अब तक साबित नहीं हुए हैं। मोदी-शाह बरी हुए हैं और चिदंबरम-सोनिया-राहुल का केस लंबित है। मगर, राजनीतिक रूप से और बदले की कार्रवाई के रूप में सजा दी जा चुकी है। यह अदालत से बाहर की सोच है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित एसआईटी ने 27 मार्च 2010 को 9 घंटे पूछताछ की थी। चार घंटे के अंतराल में दो सत्रों में यह पूछताछ हुई थी और रात के 1.10 बजे तक चली थी। 

12 साल बाद 13 जून, 2022 से आगे लगातार तीन दिन तक 30 से ज्यादा घंटे तक राहुल गांधी से ईडी ने पूछताछ की है और आगे भी यह जारी रहने वाला है। क्या यहां भी तस्वीर कुछ ऐसी ही बनने वाली है जैसी अमित शाह और पी चिदंबरम मामले में एक-दूसरे के लिए बनी थी? अमित शाह के लिए बदले का लक्ष्य पी चिदंबरम हो सकते हैं जिनकी जगह उन्होंने सरकार में ली। मगर, नरेद्र मोदी ने तो सोनिया गांधी या राहुल गांधी की जगह नहीं ली है। लेकिन, सोनिया-राहुल राजनीतिक रूप से बेताज बादशाह वाली कुर्सी पर विराजमान रहे माने गये हैं। सत्ता का सिंहासन उनके ही हिसाब से मनमोहन सरकार में चला करता था, ऐसा खुद नरेंद्र मोदी कई बार बोल चुके हैं। 

सोनिया गांधी तब यूपीए की चेयरपर्सन थीं जब मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से एसआईटी ने पूछताछ की थी और राहुल गांधी कांग्रेस के महासचिव व सांसद थे। मां-बेटे दोनों को तब नरेंद्र मोदी से पूछताछ के लिए राजनीतिक जगत में जिम्मेदार ठहराया गया था। आज सियासत में उसी घटना का सबक इन दोनों नेताओं को मिल रहा है, ऐसा कहा जाने लगा है। हालांकि दोनों ही सूरतों में जांच एजेंसियां ही अपना काम करती दिख रही हैं और लोकतंत्र में इन एजेंसियों को राजनीति के प्रभाव से मुक्त माना जाता है। तो, क्या मां-बेटे को एसआईटी जांच वाली पीड़ा के मुकाबले ईडी जांच वाली पीड़ा से गुजरना ही पड़ेगा?