व्यंग्य छपवाने को तरसते परसाई जी

हरिशंकर परसाई बड़े चिंतित बैठे थे। शरद जोशी ने उन्हें इस तरह देखा तो संदेह हुआ। पूछ लिया – क्या बात है भैया जी? इतने चिंतित क्यों हैं? आप तो वो हैं जिनकी रचनाएँ पढ़ने से सामने वाले की हालत खराब हो जाती है। कुछ बोलने से पहले ही घिग्घी बंध जाती है। आप जैसे महान व्यंग्यकार का इस तरह चिंतित बैठना शोभा नहीं देता।  

परसाई ने कहा – क्या बताऊँ शरद! एक जमाना था जब मैं व्यंग्य रचना लिखता था तो तुरंत छप जाती थीं। अब जमाना वैसा नहीं है। मेरे ही जन्म प्रदेश से निकलने वाले एक बड़े से समाचार पत्र के संपादक के नाम कई सारे व्यंग्य मेल किए। ससुरा बार-बार लौटा देता है। लौटाने का कारण भी नहीं बताता। वह तो भला हो उसका जिसकी वह छापता है, वह मेरे किसी जान-पहचान का मित्र है। उसने मेरी रचनाओं के तिरस्कृत होने का कारण बताया। तभी से मेरी हालत ऐसी बनी पड़ी है।

शरद आश्चर्य से – उसकी इतनी मजाल जो आपकी रचनाएँ तिरस्कृत कर दे। वैसे आपने व्यंग्य में ऐसा क्या लिख दिया जो उसे पसंद नहीं आई? आप जैसा शब्द चयन, भाषा चमत्कार, पंच और पाठक को बांधे रखने वाले आकर्षक विषय भला आपके सिवाय किसेके पास है? आप तो व्यंग्य की पाठशाला हैं। पाठशाला क्या पूरा का पूरा विश्वविद्यालय हैं। हमने आपसे बहुत कुछ सीखा है। कइयों को तो व्यंग्य का मतलब आपकी रचनाओं के बाद ही पता चला है।

परसाई दुखी स्वर में – देखो न शरद! मेरी पहली व्यंग्य रचना यह कह कर तिरस्कृत कर दी गयी कि उसमें मैंने ‘अच्छे दिन’ शब्द का इस्तेमाल किया।  दूसरी रचना में ‘अंधभक्त’, तीसरे व्यंग्य में ‘चायवाला’, चौथी रचना में ‘दाढ़ी’, पाँचवी रचना में ‘सूट-बूट’, छठी रचना में ‘गोदी मीडिया’, सातवीं रचना में ‘पंद्रह लाख’, आठवीं रचना में ‘भाइयों और बहनों’, नवीं रचना में ‘मंदिर-मस्जिद’ और दसवीं रचना में ‘उड़नखटोला’ जैसे शब्दों के चलते मेरे व्यंग्य घटिया घोषित कर दिए गए। जब मैंने उस महाशय से पूछा कि रचनाएँ छपने के लिए क्या करना चाहिए, तब उसने राज की बात बताई – विपक्ष पर वार करते हुए लिखिए या फिर प्रवृत्तियों पर लिखिए, चुटकी बजाते ही रचनाएँ छप जायेंगी।

शरद ने आँखें फाड़ते हुए कहा – यह क्या कह रहे हैं आप? व्यंग्य तो सत्ता पक्ष की गलतियों पर प्रकाश डालने के लिए लिखा जाता है। इसका काम तो सरकार को आगाह करना होता है। विपक्ष पर लिखना मतलब मरे हुए को और मारना है। इस तरह का लिखना कुछ भी हो सकता है, व्यंग्य तो कतई नहीं हो सकता।

अंत में परसाई शरद से प्रार्थना करते हुए कहते हैं – उस समाचार पत्र को जाने दो भाड़ में। तुम अपने नियमित स्तंभ वाले समाचार पत्र में ही क्यों नहीं छपवा देते। बड़ी कृपा होगी। आज के लोगों को कम से कम पता तो चलता कि व्यंग्य किसे कहते हैं।

शरद ने दुखी स्वर में कहा – भैया जी! अब व्यंग्य छपवाने के बारे में भूल ही जाइए। मैं जिसमें लिखता था उस समाचार पत्र के साथ-साथ देश की नामी गिरामी समाचार पत्र संस्थाओं ने व्यंग्य छापना ही बंद कर दिया। कई पत्रिकाएँ तो बंद हो गईं। अब जो व्यंग्य के नाम पर रचनाएँ छपती हैं, वे व्यंग्य नहीं मात्र कोरे कागज़ को काला करना भर हैं। भैया जी हम सब यह बातें परलोक में रहते हुए कल्पना के घोड़े पर सवार होकर कर रहे हैं। वह तो भला हो कि हमारे समय में हम जैसा लिखते थे उसे उसी धैर्य से छापने वाले लोग मौजूद थे। यदि इस युग में पैदा हुए होते तो कबके निपटा दिए जाते। 

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657