हरी भरी वसुंधरा

अंतस गंगाजल कर देना

सकल विश्व में भोले नें भी,

जड़ चेतन संचार किया, 

मन भर खुशियाँ बांटी भोले नें, 

जिसनें प्रेम व्यवहार किया! 

हरियाली के हरे-भरे इस,

मौसम नें क्या-क्या पाया,

वर्षा की बूंदों से इसने,

माटी को मनभर महकाया।

किस्मत नें इसके तन का भी,

दुल्हन-सा श्रंगार किया,

खिली हुई मिट्टी भी अब तो,

चंदन जैसी दिखती है।

भोले नें सावन भर देखो,

कितना काम-तमाम किया,

एक-एक कंकर में अपनी छवि दे,

सकल रूप साकार किया।

करें कामना भोले से हम,

अब दर्शन भी देना तुम,

जन-जीवन के अंतस को भी,

गंगाजल कर देना तुम।

कार्तिकेय त्रिपाठी 'राम'

गांधीनगर, इन्दौर,(म.प्र.)