घाव दिए जो सीने पर

घाव दिए जो सीने पर उसको भी हमने भुला दिया।

आक्रांता बनकर वो आया था उसको भी हमने पनाह दिया।।


मंदिरों को उसने तोड़ा आस्था पर भी घात किया।

उसकी वो क्रूर यातना गरल घूंट सा पान किया।


काशी मथुरा पर चोट किया और राम दरबार को तोड़ दिया।

सोमनाथ की चौखट पर उसने अपना बहसी रूप दिखा दिया।


वो आया था लूटपाट को बहसी उसकी  थी मंशा ।

पर उसके कुछ नजायज सोच   आज भी भारत में बसता ।।


खंड किया अखंड का सपना   धर्म का फैलाकर उन्माद।

बांट दिया आर्यावर्त को उस बहसी की कुटिल चाल।।


जगत विशेश्वर को तुमने बना दिया है फव्वारा।

रामलला को वर्षो तक तुमने टाट के नीचे बैठाया।।


बूत पूजने से परहेज तुम्हे है  तुम पूजते हो मुर्दा स्थल।

उस मुर्दे की कब्र के नीचे तुम ढूंढते शांति स्थल ??


गंगा की ये कल कल धारा दिखा रही प्रगति की राह ।

महादेव के त्रिशूल पर हीं टिका रहेगा काशी का भार।।


श्री कमलेश झा नगरपारा भागलपुर बिहार