क्यों बरसा आज मधु कण

सूने निलय के विरह घन में आज क्यों बरसा मधु कण?

किंकणी की मधुर स्वर से खनका विद्युत कंकण,

विस्मृत करुण आभाव आज क्यों हुआ है चिर तृप्त?

क्यों छा रहा तृषित उर तम में चंचल मेघ सघन?


पलकों पर सजीली आज नवल नेह कन,

चिर बरसते दृगजल से आज अपरिचित बन

सौरभ का सांध्य सुमन पर आगमन,

हृततंत्री पुलकित,तारों से भरा गगन।


हर्षित विस्मित यह लघु क्षण,

सस्मित है आज क्यों विरहन?

अनंग बन कौन मृदु सपनों में आया?

श्वासों में आज आह्लादित कंपन।


मूक हुये इन अधरों का क्यों विचलित मन?

प्राणों की इस पीड़ा को दिया किसने नवजीवन?

निस्पंद पंखुड़ियों को चूमकर मधुप ने,

पल्लवित किया सूने बाग में सुरभित सुमन।


           रीमा सिन्हा

     लखनऊ-उत्तर प्रदेश