मौनी बाबा से मनमौजी बाबा

हमारे एक मित्र ने सलाह दी कि जाइए और बेचवापुर का मेला घूम आइए। बेचवापुर मेले का इतिहास सन् 2014 से आरंभ होता है। उसी वर्ष मई महीने की गर्मी के साथ शुरू हुए मेले का महत्व दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। वैसे इस मेले की शुरुआत सत्तर साल पहले हुआ था। किंतु माना जाता है कि विकास नाम के बालक के खो जाने से इस मेले का रंग फीका पड़ता चला गया। इसीलिए वास्तविक रूप से मई 2014 में विकास को खोजने की डोर किसी अन्य गाँव में छोटा सा मेला चलाने वाले को दे दिया। बेचवापुर को प्रभावित करने में इस मेले का बहुत बड़ा योगदान है।  

कहा जाता है कि इस इलाके में कभी मौनी बाबा रहा करते थे। उनका मौन किसी की बतकही वाले इशारे से चला करता था। इशारों के खेल में मुश्किल यह थी कि खरीददार अ को ब और ब को अ सुनते थे। हर साल मेले में गजब भीड़ लगने लगी। लोग अक्सर एक-दूसरे से बात करते तो कहते – कहां बेचवापुर घूमने आये हैं…..? अरे आप लोग का तो वक्त है, जाइये भइया. हमरा तो धोती बिक गयी है। बहुत से लोग जाते हैं वहां लेकिन हम “वैसी” जगह नहीं जाते जहाँ ठन-ठन गोपालों को मारकर भगा दिया जाता हो। उस बाजार में किसानों, गरीबों, भुखमरों के जाने पर सख्त मनाही है। माना जाता है कि ऐसे लोगों के जाने से बेचवापुर को ग्रहण लग जाता है। विदेशियों को पता चलेगा तो क्या सोचेंगे? अब इस मेले में हवाई जहाज, ताजमहल, लाल किला, गाय, मिट्टी-लकड़ी-लोहे के खिलौने सब कुछ बिकते हैं। इतना ही नहीं विभिन्न प्रकार के पक्षियों सहित कई दूसरी प्रजातियों के कॉपी-पेस्ट टाईप पशु-पक्षियों का बाजार भी सजता है। बेचपवापुर के व्यस्त चौराहे पर चाय की दुकान लगाने वाला मेले की तारीफ करते नहीं थक रहा था। यह सोच सिर्फ उस व्यक्ति की नहीं थी। वह उस चाय की दुकान पर आने – जाने वाले हजारों लोगों की थी, जो बेचवापुर मेले पर चर्चा करते हैं। आप इस चाय की दुकान को छोड़िये, यदि आप इंटरनेट पर भरोसा करते हैं, तो जरा मुँहट्यूब पर बेचवापुर मेला सर्च करके देखिये। मुँहट्यूब एक से बढ़कर एक वीडियो के जरिये आपको इस मेले से परिचय कराता है।

मैं भी इस मेले में गया था। आइए...आइए मेहरबान, कदरदान, साहिबान। अभी-नहीं तो कभी नहीं। ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलेगा। एक छोटी और एक बड़ी दाढ़ी वाले बाबा लोगों को फेरीवाले की तरह अपनी ओर बुला रहे थे। मैंने देखा किसी ने हवाई जहाज खरीदा तो किसी ने रेल। किसी ने सेलफोन के टॉवर खरीदे तो किसी ने स्टील की फैक्ट्री। किसी ने बीमा की चॉकलेट खरीद ली तो किसी ने कुछ। हर कोई कुछ न कुछ खरीदने के लिए उतावला हुए जा रहा था। इस मेले का बिजिनेस फंडा बड़ा कमाल का था। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, यूट्यूब सब पर धड़ल्ले से प्रचार-प्रसार किया जा रहा था। यह मेला किसी करिश्माई स्थल से कम न था। यहाँ कोई घूमते-फिरते बीमार हो जाता तो उसे अस्पताल न ले जाकर दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति के चरणों में डाल देते। मरीज फट से चंगा हो जाता। बड़े कमाल की जगह थी। अंधेर नगरी चौपट राजा के नारायणदास सी मेरी हालत न हो जाए कि इससे पहले मैं निकल लेना चाहता था। पता नहीं उन दो दाढ़ी वाले बाबाओं को कहाँ से खबर मिल गई कि उन्होंने मुझे पकड़ लिया। मेरे हाथ पैर बांधकर मेरे सामने महंगे कपड़े, अच्छा भोजन रख दिया गया। मेरे बैकग्राउंड पर लिख दिया गया कि यही है विकास बाबू जो सत्तर साल पहले खो गए थे।  

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657