"मजदूर भी इंसान है"

क्या एक दिन पर्याप्त होगा किसीकी मेहनत और पसीने की कीमत चुकाने के लिए? नहीं पर साल में एक दिन सम्मानित करने से मजदूरों को हिम्मत और हौसला जरूर मिलता है। लगता है की हाँ हम भी इंसान है हमारे काम को भी सराहना मिल रही है। 

1 मई को मनाए जाने वाले मजदूर दिवस की शुरुआत तब हुई जब पहली बार संयुक्त राज्य अमेरिका में लोगों ने काम की अवधि को अधिकतम 8 घंटे प्रति दिन निर्धारित करने के लिए हड़ताल शुरू की थी। जिसके बाद 4 मई को शिकागो के हैमार्केट स्क्वायर में एक बम विस्फोट हुआ, जिसमें कई लोगों की मौत हो गई और कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

अखिल राष्ट्रीय संगठन ने इस घटना में मरने वालों की स्मृति में 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस मनाने और पूरे विश्व में श्रम कल्याण को बढ़ावा देने के लिए की थी ।

दुन्यवी हर शै में मजदूर के पसीने की उर्जा बसी है, मजदूर के लोखंडी जिस्म की तनतोड़ मेहनत से रचा बसा है हमारा संसार। सोचो मजदूर नहीं होते तो हम कितने बेबस होते। घर के निर्माण से लेकर घरकाम तक हम निर्भर होते है। पर क्या हमने कभी सोचा है मजदूर की निज़ी ज़िंदगी के बारे में मेहनत के बदले में कितनी कम मजदूरी मिलती है, मुश्किल से परिवार निर्वाह चलता है। बड़े लोगों को साहिब क्यूँ फ़र्क पडेगा आज कौन सी तारीख़ है, मज़दूर तलबगार होते है पहली तारीख़ के। मनाते है बड़े लोग जब मन चाहे जश्न लूटाकर लाखों रुपये मजदूर की पहली तारीख को मनती है होली, दीवाली। 

कब सुबह करवट बदलकर ढ़ल जाती है रात में मज़दूर को कहाँ फुर्सत अपनी पूजा काम से, तन-मन से वो वफ़ादार है अपने मालिक भगवान से। झाँको कभी उनके अंदर भी मिलेगा इंसान ही, समझ रखा है जिसको बस सबने एक यंत्र समान। खून पसीना जलाकर देता है अपना तमाम। नहीं देखता जाड़े की सर्दी, तपती धूप में जलता है रात-रात भर जागकर काम को कर्म का नाम ही देता है। बैशाखी तपती धूप हो या हो भरी बरसात, क्या जलाए मौसम की मार लोहे के बने इंसान को। तन तोड़कर देता है मजदूर मालिक को अपना सबकुछ।

बदले में क्या मिलता है उनको सुरक्षा के इन्तज़ाम, जब होता है बिमार तब क्या छुट्टी पूरी मिलती है,परिवार की नींव सा मजदूर मशीन के साथ खेलते खुद मशीन बन जाता है। हाथ कभी कट जाते है तो कभी ऊँगलियों की बारी, बड़े लोग क्या करते है परवाह मजदूर के घर-बार की।

१ मई को मनाकर दिन मजदूरों के नाम से, उल्लु सीधा करते है सब अपने-अपने स्वार्थ के, झाँककर देखो पुछो कभी तो पास बैठो इनके भी, क्या चाहिये सलामती की तुझको कोई पतवार। १२ घंटों तन-मन ताने उपर से ऑवर टाइम भी करता है, इंसान है भैया मशीन नहीं ये रहम करो इन पर। सरकारी नौकर नहीं जो पैंशन से पल जाएगा परिवार का वहन करते खतम खुद हो जाता है।

समझो, जानो, पुछो दर्द कभी मज़दूर का जो देता है तुमको अपनी उम्र का ज़्यादातर हिस्सा। उनको तुम भी दे दो सुरक्षा मरने के बाद की। परिवार की परवाह लिये वो दम तोड़ दे जब भी जिम्मेदारी लो तुम भी डूबते एक संसार की। बड़े लोग हो मजदूर के परिवार को जलाती धूप को दे दो परवाह की छैंया इनके दम पर चलती है सबके जीवन की नैया।। 

भावना ठाकर 'भावु' बेंगलोर