जो डर सो जी गया

भयभीत होने के अपने फायदे हैं। इस नई दृष्टि से सोचें तो यही मानना पड़ेगा कि अधिकांश नौकरीपेशा भयभीत नहीं होते हैं, क्योंकि वे हर महीने एक बंधी हुई रकम पा जाते हैं, चाहे अपने पेशे के साथ न्याय करें या न करें। निश्चित रूप से वे निर्भय होकर बीमार रहते हैं। उन्हें हमेशा हाय-हाय लगी रहती है और उनका हाजमा खराब रहता है, यानी वे दुःखी रहते हैं। नौकरीपेशा, जो ऊपरी आमदनी का लाभ पाते हैं, उनका हाजमा अच्छा होता है, क्योंकि वे काफी कुछ डकार जाने की क्षमता रखते हैं। यह ऊपरी आमदनी उन्हें सुखी बनाती है और वे भयभीत होते हैं कि उनकी आमदनी का यह जरिया कहीं बंद न हो जाए। लाभ की दृष्टि से सबसे समृद्ध हमारा व्यापारी समाज होता है। अगर आप गौर करें तो पाएंगे कि वे भयभीत और सुखी होते हैं।

काले धंधों का जितना बड़ा व्यापारी होता है, वह उतना ही बड़ा समाज-सेवक भी माना जाता है, क्योंकि भयभीत होने के कारण वह दान देता है और मंदिर बनवाता है। इससे यही प्रमाणित होता है कि बिना अतिरिक्त आर्थिक लाभ के भयभीत होना कठिन है और बिना भयभीत हुए भौतिक रूप से तुखी बनना संभव नहीं है। यह भयभीत होने का अर्थशास्त्रीय सिद्धांत है। अपने प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर वे दावे के साथ कह सकते हैं कि भयभीत पति और प्रेमी होना काफी फायदेमंद होता है। यदि आप केवल प्रेमी हैं और भयभीत हैं तो पति के रूप में आपके प्रमोशन के चांसेस बढ़ जाते हैं, क्योंकि कोई भी भारतीय कन्या आपसे सहर्ष विवाह करना चाहेगी, इसलिए कि वह आपकी प्रेमिका से आपकी पत्नी बनकर आपको निरंतर भयभीत बनाए रखने का सुख छोड़ना नहीं चाहेगी। यदि आप बिना प्रेमी बने सीधे ही पति हैं और भयभीत हैं तो आपको दोहरा लाभ होगा। पहला लाभ अपनी पत्नी से है। आपकी पत्नी यही चाहेगी कि भले ही सारा जहाँ आपसे भौकाल खाता हो, आप पत्नी से भौकाल खाएँ। प्रायः ऐसा होता भी है। अधिकांश दूसरों को डराने वाले पतियों की धोतियों को पत्नी के डर से गीला होते हुए देखा जा सकता है। ऐसे किसी एक अदद भयभीत पति मिल जाने पर किसी भी नारी का समस्त जीवन धन्य हो उठता है। पति होकर भयभीत होने से किसी दूसरे की पत्नी का प्रेम पाने का सुख भी मिल सकता है। अधिकांश भयभीत पति नारी मात्र के प्रति बड़े विनम्र और विनयी हो जाते हैं। आपका यह दीन-हीन भाव किसी पड़ोसन को आपसे प्रेम करने के लिए विवश कर सकता है। अक्सर पत्नियाँ अपने पतियों को भयभीत बनाने के लिए, दूसरे भयभीत पतियों की प्रशंसा करते नहीं अघाती हैं। और प्रशंसा प्रेम की पहली सीढ़ी है। भयभीत होने का प्रेमशास्त्रीय लाभ यही है।

यदि आप भयभीत हैं तो स्वाभाविक है कि बहुत सारे झंझट-झमेलों से बच जाएँगे। मान लीजिए कि मोहल्ले में किसी शरीफ को कुछ गुंडे पीट रहे हों तो आप भय से कतरा जा सकते हैं। कहीं कोई चोरी, डकैती या बलात्कार हो रहा हो तो मारे भय के आप भाग सकते हैं। आपके ऐन सामने कोई दुर्घटना हो जाए तो पुलिस के भय से आप खिसक सकते हैं। यानी आपका भय आपको कई तरह की मुसीबतों से बचा सकता है। यदि आप बुद्धिजीवी हैं तो यौं भी आपमें भय की मात्रा होगी। तब बड़े बुद्धिजीवी बनकर आपको अधिक भयभीत बनने की जरूरत होगी। यह मत भूलिए कि भय की मात्रा जितनी बढ़ेगी, आपका सुख भी उतना ही बढ़ेगा। यह हमारा सौभाग्य है कि हमारे देश के अधिकांश बुद्धिजीवी भयभीत और सुखी हैं।  

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’