मेहमाननवाजी

'अतिथि देवो भव'यही है हमारी संस्कृति,

पर एकल ने,बदल दी अब यह रीति।


न पहले से मेहमान रहे,

ना रही वो मेहमाननवाजी,

हर कोई मस्त है अपनी दुनियां में,

आगंतुक अब लगते भारी।


याद है मुझे बचपन के सुहाने वो दिन,

पड़ोस के मेहमान भी सगे जैसे लगते थे,

दिन रात आवभगत करते हम भी,

उनके सहूलियत में कोई कसर न रखते थे।


बगल की बुआ तो इतनी प्यारी थीं,

ससुराल से आतीं जब भी,गले पहले मुझे लगाती थीं।

उनके पसंद का हलवा मेरी रसोई में बनता था,

कौन अपना, कौन पराया,ये भेद ना रहता था।


जाने कहाँ गये अब वो दिन,

ताऊ,चाचा,मामा भी मेहमान बन गये,

कोई कहीं न ज्यादा दिन रुकता अब तो,

भागती हुई दुनियां के सब शिकार बन गये।


माँ को देखा करती थी मैं,

खुशी से मेहमानों के लिये रोटियां सेंकते,

पसीने से तरबतर रहती मगर

अन्नपूर्णा बन सबका पेट भरते।


आज वाकई ज़माना बदल गया है,

मेहमान भी सोचते क्यों एहसान हम लें?

क्यों न होटलों में ही ठहर लें?

मेज़बान भी किसी को आफत ही समझते हैं,

अकेले रहने में ही सुख चैन समझते हैं।


इन सब के पीछे शायद 

आधुकनिकता का हाथ है,

मृगतृष्णा के पीछे भाग रहे सब,

अवसाद एकाकीपन का बस साथ है।


                     रीमा सिन्हा (लखनऊ)