ग़ज़ल

न छेड़ो तुम मुहब्बत को दुखन में

लिपट जाएगी वरना वो कफ़न में


कोई इंसां नहीं ज़िंदा यहाँ पर

सभी बुत से बने फिरते चमन में


कभी रहते थे इनमें सिर्फ़ आँसू

तेरे रहते हैं अब सपने नयन में


चले आओ की ज़िंदा हम नहीं है

जले है हम जुदाई की अगन में


तरक़्क़ी देख इंसां की ही इंसां

जला करता है क्यूँ अक्सर जलन में


क़लम से चीर देता है वो मन को

बड़ा उस्ताद है लफ़्ज़ों के फन में


नहीं पंछी उड़ा अपने परो से

उड़ा है हौसलों से वो गगन में


प्रज्ञा देवले✍️

महेश्वर, मध्यप्रदेश

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