"मानव और मशीन में फ़र्क समझो"

मशीन के भीतर, मशीन ही धड़कता है भावनाओं के भंडार से सराबोर दिल सिर्फ़ इंसान के शरीर में ही धड़कता है।तो क्यूँ आज-कल हम हमारी परवाह में धड़क रहे दिलों को नज़र अंदाज़ करते मशीन के भीतर परवाह ढूँढ रहे है?

"छोटे से मशीन पर अंगूठा चलाते लोगों के मन में भी क्या फ़ितूर छाया है, अपनों को छोड़ परायों से प्रीत का ज़माना आया है"

क्यूँ हम अपनों से दूर और आभासी लोगों के करीब होते जा रहे है? समाज की ये बहुत बड़ी विडंबना है। संयुक्त परिवार एकल-दुकल दिख रहे है। भाई भाई से जुदा हो रहे है, पति-पत्नी से और बच्चें माँ-बाप से। और यूँ पूरे परिवार तितर-बितर हो रहे है। इंसान के दिमाग में इतना वैमनस्य भर गया है की प्यार, परवाह, सम्मान के लिए जगह ही नहीं बची। उसके विपरीत सब गैरों में वह अपनापन ढूँढ रहे है, वो भी उन गैरों में जो न कभी दिखते है, न मिलते है, न हीं कोई काम आते है। सिर्फ़ उपरी सतह का प्यार जताकर खुश करने में माहिर होते है। 

ज़रा सोचो साथ में रखे बर्तन भी टकराव पर आवाज़ करते है, तो हम बर्तनों को फैंक नहीं देते। तो ज़ाहिर सी बात है एक छत के नीचे रहते लोगों के बीच भी मतभेद होते रहेंगे, इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं की रिश्ता तोड़ लिया जाए अपनों को दूर कर दिया जाए। अपने जैसे भी हो मुसीबत के वक्त वही काम आएंगे, उसी को परवाह होगी। यह जो मोबाइल जैसे छोटे से मशीन के भीतर से आपकी तस्वीरों पर या पोस्ट पर लाइक कमेन्ट से वाह-वाही कर रहे है उसमें से एक भी काम आने वाला नहीं। 

आभासी लोग बेशक टाइम पास के लिए बनते है दोस्त, कहाँ पाँच पचास रुपये खर्च करने है आपके लिए उनको, सिर्फ़ हाय हैलो गुड मार्निग, गुड नाइट ही तो करनी है। उस पर भी एक दो बार रिप्लाइ ना देने पर आप अनफ्रेंड कर दिए जाओगे या ब्लाॅक लिस्ट की शोभा बढ़ाते नज़र आओगे। इसलिए याद रखिए आभासी दोस्तों पर इतराते अपनों के प्रति दुर्व्यवहार आपको परिवार और समाज से दूर कर देगा। 

है अपने जो साथ तो जीवन आसान है, परायों के प्रेम में वो बात नहीं जो अपनों की नाराज़गी में है। हमारे अपने चाहे कितने नाराज़ हो पर हमारे चेहरे पर चिंता की हल्की सी शिकन भी पहचान कर गले गलाकर कहेंगे चिंता मत कर 'मैं हूँ न' मैं हूँ न ये तीन शब्द हमारा आधा दु:ख हर लेते है। पर क्या दूर बैठा आभासी महज़ कहने भर को अपना इस भाव को महसूस कर पाएगा? हरगिज़ नहीं उनकी अपनी एक दुनिया है, अपना परिवार है, वह खुद अपनी ज़िंदगी में इतना उलझा है कि वह भी आपकी तरह छोटे से मशीन में चंद पल दिमाग तरोताज़ा करने ही आता है न कि आपको सहारा देने। उनका सहारे ज़िंदगी का सफ़र तय नहीं होगा। जो करीब है वही ज़िंदगी के सफ़र में हाथ थामकर आगे बढ़ने में सहाय करेगा। 

जवानी के जोश में सब अपनों को परे कर लेते है, पर अकेलेपन का अजगर अभी नहीं बुढ़ापे में गरदन मरोड़ेगा तभी कोई अपना आसपास नहीं होगा। पर बेशक वही अपने आपकी एक पुकार पर दौड़े चले आएंगे। तो अपनों और आभासियों में फ़र्क समझो और परिवार को गले लगाकर, मिल झुलकर अपनों का हाथ थामें ज़िंदगी के सफ़र को आसान बनाओ।

भावना ठाकर 'भावु' बेंगलोर