कटहल का पेड़

अक्षरा कई वर्षों के बाद मई के महीने में मायके आयी थी। सबलोग बड़ी आवभगत कर रहे थे, भई अकेली बिटिया थी, परिवार की, ये तो होना ही था। चाचा के दो बेटे थे, चाची भी दिनभर में कई बार विभिन्न पकवान बना कर उसे खिलाने आती थी। फिर भी, पापा की नजरें उंसकी उदासी को पढ़ने में कामयाबी हासिल कर रहीं थी। दो वर्ष पहले ही अक्षरा की प्यारी मम्मा कोरोना काल मे स्वर्गवासी हो गयी थी। पूरे घर मे सबकुछ वैसा ही था, नौकर, कुक सब काम कर रहे थे, पापा रिटायर होकर दिनभर हंसी मजाक कर उसको हंसाने की कोशिश में लगे थे, पर माँ की जगह शायद कोई कभी नही ले सकता। चाची भी मां के ही सदृश व्यवहार कर रही थी। 

और इसी बीच अक्षरा का जन्मदिन भी आया, सुबह से लगातार फ़ोन और सोशल साइट्स में जन्मदिन की बधाइयों का तांता लगा था। 

अचानक शाम को जब मम्मा के कमरे में फ़ोटो को ध्यान से देख वार्तालाप कर रही थी, किसी ने आकर उंसकी आंखों को पीछे से ढका वो बोल पड़ी, "कौन है, ये स्टाइल तो जयश्री का है।"

"सही पहचाना, देखो अंकल ने फ़ोन किया, मैं पचास किलोमीटर कार चलाकर तुमसे मिलने आ गयी। हैप्पी बर्थडे डिअर।"

और दोनो सहेलियाँ गले मिलने लगी।

"क्या बताऊँ, जयश्री, कुछ नही अच्छा लग रहा, मम्मा के बिना।"

"क्या यार, तुम भी एक माँ हो, अभी तक ये नही समझ पायी कि सबको एक दिन जाना है, जो आंखों के सामने प्यार लुटा रहा, वो तुमको नही दिख रहा, तुम्हारे पापा भी बहुत दुखी हैं, उनकी भी उम्र हो गयी है।"

"सही कह रही हो। चलो मेरे साथ, अब मैं पापा कीआंखों में ही मम्मी का अस्तित्व देख लूँगी।"

और दोनो सहेलियाँ बाहर आई, पापा ने आस पास के कई बच्चो और रिश्तेदारों को बुलाकर जन्मदिन की पार्टी दी थी। और वो पार्टी उसी कटहल के पेड़ के नीचे थी, जो 35 वर्ष पहले मम्मा ने खड़े होकर माली से लगवाया था, "मेरी बेटी को कटहल की सब्जी बहुत पसंद है।"

और पार्टी के खाने में भी उसी पेड़ के कटहल की मस्त मसालेदार सब्जी अक्षरा और सबने मम्मी को याद करके खाया।

अक्षरा को यू महसूस हो रहा था, मम्मा भी उसे हैप्पी बर्थडे कह रही थी।

दो दिन बाद अक्षरा अपने घर जाते समय कुछ दिन के लिए पापा को भी ले गयी।

स्वरचित

भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर