बुफेट, बफेट, बुफे या बफे



महंगाई के दिनों में दावत का न्यौता! वाह! सुनते ही पाचन तंत्र के सभी अंग खिलखिलाने लगे। बहुत दिनों के बाद उन्हें पचाने के लिए कुछ मिलने वाला है। वरना उन्हें संदेह हो रहा था कि वे शरीर के अंग हैं भी या नहीं। सब कुछ ठीक-ठाक था लेकिन चक्कर दावत के तरीके से था। अंग्रेजी में उस दावत की स्पेलिंग तो मुझे पता है किंतु उच्चारण करना कैसे है, यही मेरे लिए टेढ़ी खीर है। कभी बुफेट कहता हूँ तो कभी बफेट। कुछ लोगों के कहने पर बुफे तो कुछ लोगों के कहने पर बफे। मुझे अभी तक यह समझ नहीं आया कि मैं खाने जा रहा हूँ या दिमाग का दही बनाने।  सामान्य भाषा में कहना हो तो खड़े होकर, हाथ में प्लेट लेकर दर-दर की ठोकरें खाते हुए परोसने वाले के पास पहुँचकर खाने को जो कुछ भी मिल जाता है उसे ही ‘वो’ (बुफेट, बफेट, बुफे, बफे) कहते हैं। परोसिया भी ऐसा कि किसी कोड लैंग्वेज का पालन करने वाला रोबोट हो जैसे। वह परोसेगा भी ऐसे जैसे उसके घर से दे रहा है। दूसरी बार जाने पर वह ऊपर से नीचे ऐसे घूरता है कि तीसरी बार जाने से पहले शर्म के मारे मर ही जाएँ।

आप मानें या न मानें हमारे लिए यह दावत किसी आफत से कम नहीं है। ऐसी दावतों में बड़ा सज-धजकर जाना पड़ता है। एकदम शोरूम के बुत की तरह। ऊपर से चंगे और भीतर से भूखे-नंगे। हॉल में जैसे ही बैठे, अचानक से भगदड़ मची। पता चला कि ‘खड़ाखाऊ’ दावत के व्यंजनों पर से ढक्कन उतार दिए गए हैं। ऐसे समय में ‘अब न चूक चौहान’ की तर्ज पर लंबी-लंबी कतारों में बाढ़ में बर्बाद हो गए किसी शरणार्थी की तरह राहतसामग्री हेतु खड़े होने के लिए विवश होना पड़ता है। ऐसी दावतों में ‘पहले आओ अच्छा पाओ’ की स्मीक खुलेखाम धड़ल्ले से चलती है। देर हुई तो समझो गए काम से। हमारी हालत तो और भी बदतर थी। हाथ में प्लेट लिए खाना तो दूर उसे देखने भर के लिए तरस रहे थे। मेरे एक मित्र की हालत तो ‘लाएँ हैं तूफान से कश्ती निकालकर’ की ‘तर्ज पर लाएँ हैं बिरयानी अपना कुर्ता फड़वाकर’ जैसी हो गई थी। इसलिए इन दावतों की अदाओं से कुछ अनुभवी लोग अपना परिधान बचाकर पूरा ध्यान खाने पर रखते हैं। कभी-कभी तो लगता है ऐसे विशेषज्ञों से इन दावतों में जाने का प्रशिक्षण ले लेना चाहिए।  

हमारी भाभी जी का हाल तो और बुरा था। ननद से माँगी हुई साड़ी पहनकर व्यंजन बटोरने की हड़बडी में उसे बटर पनीर के सुपुर्द कर दिया। अब वह खाना-पीना छोड़कर झल्लाते हुए साड़ी की धुलाई में लग गई हैं। जिंदगी है तो फिर कभी खाया जा सकता है, लेकिन यह साड़ी नहीं होगी तो ऐसी जिंदगी भी किस काम की। खाया-पिया कुछ नहीं ननद से साड़ी की डाँट सुनो अलग से। कुछ लोग तो काल्पनिक होते है। या यूँ कहिए कि बड़े दार्शनिक होते हैं। वे दूसरों की तश्तरी में ताका-झांकी कर मृगतृष्णा की तरह भूख-प्यास मिटा लेते हैं। यही लोग आगे चलकर ‘सुखी रहने के 101 उपाय’ जैसी पुस्तकें लिखते हैं।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’