निसर्ग-आत्म प्रेरणा

निसर्ग की अदृश्य,

गहन  गोपन  

अनुर्वर शुष्क अवनि,

जन-बहुल प्रदेश से दूर,

असिंचित  भू-बंजर।


वहीं व्यक्त होता,

एक नवांकुर।

हरित पौधे का पुष्प-प्रवर।

रुचिर पीत कलेवर।

परिवेश तो,असत्कारशील,

पौध-भावना सत्य-सुशील।


यह स्व - रचना है अद्भुत

कितनी सहनशील,

अंग-प्रत्यंग कुशल।


न  मृदा, न खाद,

न माली का संरक्षण।

इक फलक जीवधर्मिता,

दूजी  प्रकृति - रचनाधर्मिता,

कोमलता,  परोपकारिता।


मिलती है, सूझ-ज्ञान।

सूक्ष्म आत्म-शक्ति

स्थूल भौतिकता

को करती ही  है पराभूत।


संघर्ष करते, स्नेह से

शुष्कता को

कोमल बनाती सरल

आत्म-अभिव्यक्ति।


उपवन  में  रहते  पालित

प्रशिक्षित पुष्प।

शुष्क  विजन  देश  में  है,

आत्म - प्रस्फुटित

सहज जीवन कला।


सच है, तज  कर  अहंता

भेदाभेद भाव,

साध लें भुवनधर्मिता।


मौलिक,स्वरचित

@ मीरा भारती,

  पटना बिहार।