तीखा तीर

मजहब  का  उन्माद  बुरा  है 

लाती कटूता समाज में  भारी 

शदियों  से  होता  चल  आया 

खेलते रहे   हैँ  खेल  व्यापारी 

समय  रहते हुये  हम  न  चेते 

कीमत  चुकानी  पड़ेगी  भारी 

       --- वीरेन्द्र  तोमर