ग़ज़ल : क़र्ज़ों के लिए

हम पिघलते रहें बन शम्मा यूँ रिश्तों के लिए

जैसे किश्तें हो चुकाना मुझे क़र्ज़ो के लिए 

किल्क चलती है सुखनवर के दिलों से जब भी

दिल नहीं जान लिखी जैसे किताबों के लिए

हम जवानी को मुहब्बत पे लूटा आये है

मुख़्तसर साँस ज़रूरी जाने कितनों के लिए

मुश्त-ए-ख़ाक अगर होना है इक दिन सबको

फिर क्यूँ तुम क़त्ल किये जाते हो तख़्तों के लिए

जिद अगर मेरी है अंबर में चले मेरे कदम

पर नहीं हौँसले काफी है उड़ानों के लिए

तख़्लिया करके रखा है हमें खुद से सबने

हमने बस दिल को बिछाया कभी अपनों के लिए

पस-ए-पर्दा न उठा चाँद भी शरमाएगा

थम ज़रा जाएगी धड़कन मेरी लम्हों के लिए

प्रज्ञा देवले✍️