अक्षय तृतीया २०२२

  भुवन में  आत्म - तत्व ही  वंदनीय,

  ज्योति  जिसकी  जले  दिन अक्षय।  

 

  गीता-प्रवचन से युग -मन  प्रक्षालन,

  धर्म-युद्ध  संग  द्वापर का समापन।

   

  सच, दान करें, दिन है यह महान,

  सहज, निःस्वार्थ हो देने की भावन।

 

  न प्रतिफल-विचार, वृत्ति  तपस हो,

  इक ध्येय कि, समाज समरस  हो।


  चिंतन, साधन हेतु, भू है,धर्म -उपवन,

  हर  धर्म  है आत्म-तत्व का प्रकाशन।

 

  अक्षय तीज सदा है, निर्वैरता -संकल्प,

  सभी स्वयं रूप,अपनत्व ही विकल्प।

 

  क्षमा सहज-धर्म, होता सद्गुण  वरण,

  परशुराम करें, राम को शक्ति-अर्पण।

 

 किसान  करें, अक्षय उपज का शगुन,

 जैन धर्मी करें, आदि-गुरु तप- स्मरण।


 अठारह-पुराण में  व्यास -वचन,परम्

 अक्षय धाम बसे आत्म-तत्व, विश्व-धर्म।

 

 त्याग,अर्पण  हेतु  हो, दान-धर्म  ध्यान,

 समत्व -शिशु पले, करे तीज को नमन।

   

   @ मीरा भारती,

      पुणे,महाराष्ट्र।