मैं तरंग हूँ

मैं तरंग हूं  उठ कर  गिर कर बन  जाती हूं ज्वार  भाटा

कभी गगन का चुंबन करती कभी अवनि  से जोड़ूं नाता

नभमंडल पर जब लहराती इन्द्रधनुष बनकर खिल जाता

ध्वनी तरंगें जब लहराती  स्वर सप्तम्  संगम बन जाता 


कभी ज्वार बन पग धोवे कभी जलधि में गोते खाती

शून्य गगन में मैं बहती हूँ उड़ती चिड़िया होड़ लगाती

अंतर्मन की गहराई में जब  चिंतन की लहरें उठती हैं 

कभी धरा पर कभी गगन में  ऊँ ध्वनि आभास कराती


पूनम और अमावस जीवन उस पर इतना इतराती हूँ 

 जैवशक्ति की लहरें उठतीं   मैं खुद को बौना  पाती हूँ 

कौन पराई  कौन है अपनी  विश्लेषण उसका करती हूँ 

मैं तरंग अब निश्छल होकर अनंत में  खुद को पाती हूँ

 

                        बच्चूलाल दीक्षित 

                     दबोहा भिण्ड/ग्वालियर