ये तंग गलियां

डुप्लेक्स घर बालकनी में प्यारा का झूला,कॉलोनी का बड़ा सा सुन्दर पार्क जो घर के ठीक सामने है। सुंदर - सुंदर फूल, हरे - भरे पेड़ पौधे, झूले पर झूलते बच्चे,रंग बिरंगे परिधानों से सुसज्जित बच्चे बूढ़े एवं जवान, बोर होने ही नहीं देते। आस-पास नाममात्र का कंस्ट्रक्शन, प्रदूषण रहित स्वच्छ वायु। यह सब छोड़ एक नया अनुभव लेने मेरा कुछ दिनों के प्रवास पर दिल्ली आना हुआ। दिल वालों की दिल्ली में जहां मुझे अल्प प्रवास पर रहना था,वहां हाल बेहाल कर देने वाला माहौल लगा। 

मैं आश्चर्य चकित थी दिल्ली की उन भूल भुलैया वाली गलियों का मंजर देख कर। कुछ गलियों के नम्बर तो कुछ बिना नम्बर की गली। पूछने पर बताया की इस गली का कोई नम्बर नहीं है आप तो प्रेस वाली गली याद कर लो। गलियों को याद रखना अत्यंत कठिन काम, प्रतीत हो रहा था। इसके साथ ही कहीं-कहीं इतनी सकरी गली की मेरी तरह के दो मोटे लोग निकलने का प्रयास करें तो आपस में टकरा सकते हैं। यहां आकर ऐसा महसूस हुआ कि लोगों नें मकान या दुकान का कुछ हिस्सा आगे तक बढ़ा लिया है।

 ऐसा एक तरफ से ना होकर चारों तरफ से होता रहा। जिसके परिणाम स्वरूप दिल वालों की दिल्ली की तंग गलियां निर्मित हुईं। इतनी तंग गलियां,क्या कहें ऐसा लगा कि इस गली से सामान्य कद काठी के तीन लोग निकलें तो फिर अन्य के लिये गुंजाईश कहां। यदि लोगों को यहां से वहां आने जाने की आवश्यकता नहीं होती तो शायद यह गली भी कबसे खत्म हो गई होती। ना जाने ऐसी कितनी गालियां मानव आवश्यकता और अन्य कारणों के चलते या तो अत्यंत संकरी हो गईं या समाप्त हो गई होंगी। 

मैं यह सोचने पर मजबूर हूं की कभी यहां किसी तरह की अनहोनी घटना जैसे आग लगने पर फायर ब्रिगेड की गाड़ी का आना,अचानक मकान के किसी हिस्से का ढह जाना,गली में किसी वाहन का फंस जाना या बिमार के लिए एंबुलेंस का आना कैसे सम्भव होगा। इन सभी समस्याओं से लोग कैसे निजात पाते होंगे। पूछने पर बताया सब हो जाता है मैडम बरसों से ऐसा ही चल रहा है। 

कुछ गलियां तो इतनी तंग (संकरी) हैं कि साईकिल मोटर साइकिल के अलावा और कोई वाहन अंदर आता नहीं दिखा। सीधी सी बात है मुसीबत में मदद कैसे प्रदान करी जाये। पास-पास मकान होने से खुली हवा का आगमन भी उतना नहीं जितनी की आवश्यकता है। गली मैं सिर उठा कर उपर देखो तो बेतरतीब तार का जाल अपनी अलग ही व्यथा बयान कर रहा है। यदि बालकनी में खड़े हो जाओ तो लगता है,  हम सामने वाले की बालकनी के काफी नजदीक हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि हम उसकी बालकनी में हैं और वह हमारी बालकनी में मौजूद है। इतनी घनी आबादी के बावजूद भी शोर शराबा बिल्कुल भी नहीं। 

बस सब्जी भाजी,पीने का पानी बेचने वाले,या अन्य सामान बेचने वालों की ही अक्सर आवाजें सुनाई दे जातीं। किसी भी घर से तेज आवाज में बात करने या हंसने की आवाजें सुनाई नहीं देतीं। यहां लोग बाल्कनी में बैठकर गपशप करना या बिना किसी कारण के खड़े होना अथवा सुबह शाम चाय की चुस्कियों का लुत्फ उठाने वाला माहौल नहीं बनाते हैं। यहां लोग बालकनी या खिड़की में से झांकते नहीं दिखाई देते हैं। 

एक दूसरे के परिवार की निजता का भरपूर ध्यान रखते हैं। इसके साथ ही यहां बहुत कम बालकनी में कपड़े सूखते हुए दिखाई देते हैं। आश्चर्य होता है कि इतनी घनी बस्ती और इतने अधिक रहवासी यह लोग स्वयं तथा परिवार के कपड़े कहां सुखाते होंगे। जहां थोड़ी चौड़ी गली हैं वहां बिल्डिंगों की अपनी पार्किंग बनी हुई है। यहां ड्राइवर भी बड़े एक्सपर्ट हैं। इतनी कम जगह में कैसे बड़ी -बड़ी गाड़ियां अन्दर बाहर कर लेते हैं। यहां अधिकांश लोग अपनी गाड़ी स्वयं ही चलाते हैं, यह देखकर ताज्जुब होता है कि यह लोग इतनी कम जगह में से गाड़ियों को रखना निकालना और इन संकरी गलियों में गाड़ी चलाना,इस सब में कैसे संतुलन स्थापित करते हैं। यह सभी बातें शोध का विषय होकर इनके अच्छे मेनेजमैट का नतीजा भी है। 

एक और बात नें मुझे बहुत अधिक प्रभावित करा वह है,नजर का पर्दा। आदमी औरत या बच्चे बालकन या खिड़की में किसी काम से आते भी हैं तो नजरे उठा कर देखते तक नहीं। जिस काम से आये,उस काम को पूरा करा और घर के अंदर। यहां अधिकांश पर्दानशीं महिलायें हैं। 

इतनी घनी बस्ती होने के बावजूद भी यहां लोग झुंड बना कर बतियाते हुए नहीं मिलेंगे। दिन में सब्जी- भाजी बेचने वालों के साथ ही हर दस से पंद्रह मिनट के अंतराल के बाद पीने का पानी बेचने वालों की आवाज़ आती रहती हैं। जिन लोगों के घरों में पानी शुद्धिकरण का यंत्र नहीं है वह लोग पानी बेचने वालों से पानी खरीदते हैं।

मेरा मानना है कि मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहे छात्रों को हो सके तो अपने अध्ययन के दौरान जब उनकी इंटर्नशिप चल रही हो तब इन गलियों में रहने वाले और यहां आने जाने वाले वाहनों तथा यहां जो तंग गलियों में दुकानदार दुकाने संचालित कर रहे हैं। उन सभी का आपस में तालमेल वास्तव में मैनेजमेंट का एक उतम उदाहरण है। यह सीखने की बात है। 

इतनी घनी और सघन आबादी वाले क्षेत्र में शांतिपूर्वक जीवन जीना वास्तव में एक कला होकर इनके उत्तम मैनेजमेंट का उदाहरण है। हां एक बात और कचरा गाड़ी अपने समय से आती है फिर भी लोग सुबह - शाम अपने-अपने घर के सामने साफ सफाई करते नजर आ ही जाते हैं। फिर भी गालियों में यहां वहां खाद्य सामग्री के खाली रेपर,पन्नी आदि दिखाई दे ही जाते हैं। जिससे गंदगी हो ही जाती है। 

यहां माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी के द्वारा शुरू करे गये स्वच्छता अभियान को थोड़ा और अधिक बल देने की आवश्यकता महसूस हुई। यहां के लोग साफ सफाई के लिये मध्यप्रदेश के इन्दौर शहर से सफाई के प्रति जागरूक लोगों तथा वहां के प्रशासन से जानकारी और प्रेरणा ले सकते हैं। चलते-चलते एक बात और साहित्यकार,कवि,चिंतक,विचारक और एक पत्रकार के नजरिये से चंद पंक्तियां इन तंग गलियों के लिये।

इन तंग गलियों को शिकायतें तो बहुत होंगी।

चौड़े होकर रहना तो यह भी चाहती होंगी।

साफसुथरापन किसे अच्छा नहीं लगता। 

इन्हें भी साफ,शुद्ध वातावरण में रहना 

अच्छा लगता होगा। 

कौन सी गली चाहती होगी उसके सर पर 

केबलों और तार का जंजाल बिछा हो।

हवा और सूरज का संग इन तंग गलियों 

को भी भाता होगा। 

रमा निगम वरिष्ठ साहित्यकार 

ramamedia15@gmail.com