मन के दायरे

कोमल

नाजुक

अनमोल

बेजोड़

कटीले

पथरीले

अनमने

लचीले

कठोर

सुलझे

उलझे

होते हैं मन के दायरे

जो बन जाती है 

तकदीर हमारी

चाह कर भी भेद नहीं

पाते फिर लकीरों से

खिंचे हमारे इर्द गिर्द

ये मन के दायरे

कभी टूटते

कभी बनते

कभी गिरते

कभी संभलते

कभी प्यार

कभी तकरार

कभी मेलजोल

कभी नफरत

कभी शान्ति

कभी अशान्ति

कभी बिखरते

कभी संवरते

कभी सपना

कभी हकीकत

कभी खुशी

कभी उदासी

कभी आँसूं

कभी मुस्कान

बस इन्हीं में 

उलझते सुलझते

रहते हैं

मन के दायरे

 अनदेखी डोर से।।

.....मीनाक्षी सुकुमारन

       नोएडा