बच्चों के लिए बूस्टर डोज बनती जा रही कोचिंग/ ट्यूशन क्लास

शिक्षा एक बदलाव की पहली सीडी है जिसके माध्यम से मनुष्य अपनी सफलताओं की और अग्रसर होता है l शिक्षा के लिए सरकारी तंत्र से लेकर निजी तंत्र में भी बहुत काम हुआ है जिससे शिक्षा को एक उचित दिशा मिल सके l समाज विकास में शिक्षा का एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है, शिक्षा पाकर ही मनुष्य अपने आप को समाज में एक अच्छा ओहदा एवं पद पाकर सम्मान पता है एवं सही गलत का निर्णय का पता है l शिक्षा के लिए पुराने समय में पुरानी आश्रम शिक्षा इतनी मजबूत और कारगार थी कि एक बार को विद्या विद्धर्थियो ने सीख लिया यानि पत्थर की लकीर हो गई इस सीख को जैसे जीवन भर याद रखा जाता था l वही आज के समय में शिक्षा मंदिर का स्थान धीरे-धीरे प्राइवेट ट्यूशन की कक्षाओं ने ले रखा है l इसका आर्थिक, मानसिक ईवा सामाजिक प्रभाव बच्चों सहित अभिभावकों में भी देखने को मिल जाएगा l

प्राइवेट ट्यूशन छात्रों की पढ़ाई का बोझ व तनाव दोनों ही बढ़ा रहे हैं। अच्छे से अच्छे निजी स्कूल में पढ़ने के बाद भी बच्चों को ट्यूशन व कोचिंग करने का चलन बढ़ता ही जा रहा है। ये जहां बच्चों की कक्षाओं में पढ़ाई के प्रति उदासीनता आ रहा है वहीं अभिवावकों की आय पर जोरदार चपत भी लगाता है। कम एवं माध्यम वर्गीय परिवार की आय का लगभग एक चौथाई भाग बच्चों के स्कूल की फीस ट्यूशन में खर्च हो जाती है। राहुल एक रियल स्टेट कंपनी में कार्यरत हैं। वो बताते हैं, “मेरे दो बच्चे हैं एक तीसरी कक्षा में और दूसरा आठवी । दोनों की हर महीने स्कूल की फीस सात हजार बैठती है। 

इसके बाद भी ट्यूशन पढ़ाना पड़ता है जिसकी भी अच्छी खासी फीस देनी पड़ती है।” शिक्षा की गिरती गुणवत्ता लगातार बढ़ती प्राइवेट कोचिंग सेंटर की दुकानों का एक कारण यह भी है कि लगातार शिक्षा व्यवस्था का स्तर गिर रहा है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़ाई का स्तर गिरता जा रहा है, सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के नाम पर मजाक होता है ये आप सभी जानते हैं ऐसे में प्राइवेट कोचिंग ही सहारा बन रही है। अगर स्कूलों में ही सही से पढ़ाई हो तो इसकी जरूरत ही न पड़े।” परन्तु आज के परिवेश में देखा देखी ये तथ्य भी झूठा हो रहा है इसका कारण है मां बाप बच्चों पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं कि उनको फलाने से ज्यादा नम्बर लाने ही लाने हैं ऐसे में वो खुद उन्हें कोचिंग की तरफ ढकलेते हैं। 

ऐसे में बच्चे के ऊपर तनाव बढ़ता ही जाता है और उसे सेल्फ स्टडी का समय ही नहीं मिलता जो सबसे ज्यादा जरूरी है।” बच्चों का बढ़ रहा तनाव। लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा और अभिभावकों के पास समय का अभाव हर अभिवावक को अपने बच्चे की भविष्य की चिंता रहती है। धीरे-धीरे हर क्षेत्र में कंपटिशन लगातार बढ़ रहा है। भारतीय शिक्षा प्रणाली के अनुसार अच्छी नौकरी के लिए परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा अंक लाना भी जरूरी है जिसके चलते हर अभिवावक अपने बच्चे पर अतिरिक्त दबाव डालता है, उसे अच्छी से अच्छी कोचिंग व ट्यूशन कराता है जिससे वो अधिकतम अंक ला सके।

भोपाल निवासी पुष्पा बुनकर बताती है कि "स्कूलों में एक एक क्लास में इतने बच्चे होते हैं कि सिर्फ वहां की पढ़ाई के भरोसे अच्छे नंबर लाना संभव नहीं है, अभिभावकों की सबसे बड़ी मजबूरी यह भी है कि कोचीन के चलन के कारन बच्चे घर में ही स्वयं पढ़ाई करने से कतराते है व अपने माता-पिता या परिजनों से नहीं पढ़ पाते l साथ-साथ आस पड़ोस के बच्चे यदि कोचीन जा रहे और हमारा बच्चा नहीं जा रहा यानि समाज में हमारा नाम ख़राब होने जैसा लगता है l

हर माता-पिता चाहते है कि उनका बच्चा एक अच्छा स्कूल में पढ़ाई करे इसके लिए माता-पिता पैसा खर्च करने में पीछे नहीं हटते l एक अच्छा स्कूल यानि अच्छे पढ़ाने वाले शिक्षक, अच्छी शिक्षा व्यवस्था, अच्छी पढ़ाई और इसके बदले में मोटी फीस l ये सब माहौल मिलने के बाद भी बच्चा नहीं बच्चा को ट्यूशन की जरुरत पड़ रही है तो इस प्रकार के स्कूल में पढ़ना और इतनी मोटी रकम स्कूल को देना व्यर्थ हो जाता है ल

 ट्यूशन बच्चों के लिए एक प्रकार की बैसाखी है जिसके सहारे वह अपनी शिक्षा की सीडी चढ़ता है, यदि ट्यूशन नहीं तो वह ऐसे धडाम से गिरता है कि जैसे शिक्षा का आधार की छिन गया हो l  कुछ अभिभावकों को स्कूल से ज्यादा ट्यूशन में विश्वास होता है वो भी ऐसे स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे के अभिभावक जो शहर के सबसे उच्च गुणवत्ता देने वाले स्कूल, ये सब देखि दिखाई या फिर आज के परिवेश में ये फैशन बनता जा रहा है l

ट्यूशन की आवश्कता ऐसे बच्चो को पढ़ती है जो अपना मुख्य पढ़ाई के हटकर और कुछ अलग तैयारी कर रहे है जिसे वह स्कूल कालेज या कोई संसथान में नहीं पड़ पा रहे है l ऐसे में स्वयं की तैयारी के साथ साथ एक सराहा की आवश्यकता होती है l जैसे किसी जॉब के लिए तैयारी, कॉम्पीटिशन एग्जाम की तैयारी, कोई अन्य रुचिकर विषय का अतिरिक्त ज्ञान आदि l 

परन्तु आज के समय में बच्चा पढ़ाई की जैसे ही पहली दहलीज में आता है इसे ट्यूशन के पिंजरे में झौक दिया जाता है l जिस नन्हा बालक को ट्यूशन का ट नहीं पता उसे ट्यूशन जाने केयह लिए मजबूर किया जाता है l क्या यह बैशाखी उसे कमजोर नहीं बनाएगी यह सोचने के लिए गंभीर मुद्दा है l क्या ट्यूशन की पढ़ाई के आलावा बच्चों की पढ़ाई का कोई विकल्प नहीं है ? इसे समाज को गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है l यह ट्यूशन रुपी दीमक बच्चों के बढ़ते विकास को चट न कर जाए इससे पहले हमें सभालने की आवश्कता है l

हर बच्चे को डॉक्टर-इंजीनियर बनाने की चाह कोचिंग को दे रही बढ़ावा "हर मां-बाप अपने बच्चे को डॉक्टर या इंजीनियर बनाना चाहता है स्कूल की कक्षाओं में कम से कम 30 से 50 छात्र होते हैं, ऐसे में वह कहते हैं कि खासकर सरकारी स्कूलों में एक कक्षा में अमूमन सौ से ज्यादा छात्र होते हैं तो इसलिए वो उनका बच्चा उनके रिश्तेदारों व आसपास के बच्चों से आगे रहें इसलिए वो ट्यूशन पढ़ाते हैं।” 

सरकारी स्कूल प्राइवेट से ज्यादा खर्चा करते हैं आर्थिक विषमता का शिक्षा पर असर उच्च शिक्षा में अभी भी बहुत बड़ा फर्क दिखता है। बेहतरीन गुणवत्ता वाले संस्थानों तक पहुंचने में भी बहुत फासला है और भारत में ये शिक्षा के लिए भुगतान करने की क्षमता पर निर्भर है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि जांच परीक्षाओं के जरिये कमजोर बच्चों की क्षमता को आंका जाता है। ये बच्चों के सीखने पर नकारात्मक प्रभाव डालता है और उन्हे अपमान के तौर पर दंडित करता है।

स्कूलों की शिक्षा को और मजबूत करने की आवश्यकता है जिससे बच्चों को ट्यूशन की आवश्यता ही न पड़े l बच्चा बस्ता के बोझ में आधा तो दब ही जाता है रही कसर ट्यूशन निकाल देती है l सुबह से शाम तक नन्हा सा बच्चा बस स्कूल, बेन, ट्यूशन आदि में निकाल देता है उसको तो अपने हिसाब से साँस लेने की फुर्सफ़ नहीं मिलती, बेचारा इतने कम आयु में उसे इतना प्रेसर दे दिया जाता है कि इस प्रेशर में वह दबता ही चला जाता है l ट्यूशन  की अंधी दौड़ में बच्चों को झौकने से बचाया जाते व सेल्फ स्टडी के लिए प्रेरित करते हुए मेहनत की शिक्षा पर बच्चों का ध्यान आकर्षित करने की आवश्कता है l इससे बच्चे आत्मनिर्भर बनेगे और अपना बेहतर भविष्य निर्माण करेंगे l   

लेखक / विचारक 

श्याम कुमार कोलारे 

सामाजिक कार्यकर्ता, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)

shyamkolare@gmail.com