"अश्क़ों का समंदर..."

बिखरे हुए फूल चमन के भीतर ।

मायूस है गुल गुलशन के भीतर ।।


घाव भी है  मलहम भी है  दिल  में,

अश्कों का समंदर नयन के भीतर ।


ये आंखे हंसती है  ये आंखें रोती है,

मेरी दर्द छुपा है इन रुदन के भीतर ।


यादों को शहरों में  ही छोड़ दिया है,

महसूस है कंपन धड़कन के भीतर ।


तुम्हें याद करने की  एक ही मकसद,

कुछ शीत बिंदु मिले जलन के भीतर ।


बिखरे हुए फूल चमन के भीतर ।

मायूस है गुल गुलशन के भीतर ।।


स्वरचित एवं मौलिक

मनोज शाह 'मानस'

manoj22shah@gmail.com