सुनों ईश्वर..

क्यों ईश्वर,,जवाब तो दोगे न

आखिर किस स्याही से खींचते हो तुम

ये भाग्य रेखाएं

इस सृष्टि की ,

कि उसके हिस्से में आती हैं सिर्फ

अश्रुपूरित कविताएं ही ,

सुनों..

अबकी लिख देना गाढ़ी अमिट लकीरों से

एक सतरंगा इंद्रधनुष

उसकी कोमल हथेलियों के बीचोबीच, ताकि

एक हंसता-खेलता आवागमन जारी रहे

सभ्यताओं का !!

नमिता गुप्ता "मनसी"

मेरठ, उत्तर प्रदेश