दोहे चिंताएं

रहते है मृत्यु तलक,  ये चिंताएं ढेर ,

सुख को चाहत में सदा ,कर देते अंधेर।।


विषय भोग में रत रहे, ढूंढे नित उपभोग,

खूब कमाते धन यहां, करते नये प्रयोग।।


सोचे वह कर लूं सभी, धन दौलत है पास।

बना रहूं उन्मुक्त मैं , हो कोई जो खास।।


मै हूंँ धनी संसार में ,बढ़ा हुआ परिवार।

जीत सभी को लूं अभी, रहे न कुछ तकरार।।


सोचे वह बलवान हूं, सब लूं आज खरीद।

मैं तो  लक्ष्मीपति बना, मेरे सभी मुरीद।।


मुदित करे अज्ञान जब, कैसे तब समझाए।

मोह यहां जंजाल है,अब कोई उन्हें बताएं ।


रावण भी नहि ले गया,  अपने साथ छदाम,

जेब कफन में है नहीं,दौलत का क्या काम।।


गया सिकंदर भी यहां , जग से खाली हाथ।

खुले हाथ मै  तो चला, बोल गया वह नाथ।।


माया ने बांधे यहां, तीन लोक हैं आज।

मन अशांत जब भी रहे, होए नहीं  कुछ काज।।


                        रचनाकार ✍️

                        मधु अरोरा