तरु की छाया

विकट दुपहरी बीच राह में,

राहगीर का मन हरसाया।

बैठ किया आराम जो उसने,

शीतल मिली तरु की छाया।।


चरने निकले सुबह से देखो,

चार पैर  की  सब चौपाया।

बैठ  किया  आराम  सभी ने,

मिली सभी को तरु की छाया।।


सभी परिन्दों ने रहने हेतु ,

वृक्ष पर अपना नीड़ बनाया।

गर्मी बर्षा से करती रक्षा,

दे सुकून तरु की छाया।।


डाला झूला सावन माह में,

सखियों को खूब झुलाया।

ठंडी-ठंडी चलती हवायें,

झूले झूला तरु की छाया।।


करे किसान खेत में काम,

भूख का अब वक्त है आया।

खाना खाता देखो आराम से,

बैठ आज वह तरु की छाया।।


गीता देवी

औरैया (उत्तर प्रदेश)