क्षणिक बचपन

जीवन की सरगम साँसों में

खिल उठे है नवगान फिर!

आते-जाते लम्हों में सदा

लौट आती बहार-ए-बहर फिर!


बच्चों - सी मुस्कान लिए 

बीता हर लम्हा गुजरा साँसों से

तार जोड़ने को आतुर रिश्तें!

चमक उठी झाँक लबों से धवल

हरीभरी मोती सी मुस्कान फिर!


क्या खोया जीवन - सालों में

गणना न थी इस जीवन में

पाया है जो खास आज हे दैव!

कर्ज है इन साँसों पर 

ऋणमुक्ति का कोई उपाय नहीं।


मात-तात के विस्तृत उर-नभ में

पंख फैलाकर उड़ी सदा 

लौटा है वो आज दिवस हे दैव!

लौट सकी न वो अठखेली-अलबेली


शुभ अवतार महतारी आज 

संदेश शुभ सकल जगत में है 

बधाई देकर जीवन फिर मुस्कान

लौट आया क्षणिक बचपन फिर!


परिचय - ज्ञानीचोर

मु.पो. रघुनाथगढ़,सीकर राज.