"विरह का जंगल..."

      

नींदों का अमंगल मरुभूमि है ये  ।

विरह का जंगल सूनी सूनी है ये  ।।-2


भयंकर रातों की यादें है ये  ।

अदभुत त्रास की प्यासे है ये ।। -2


ख़्वाबों का अमंगल मरुभूमि है ये । 

विरह का जंगल सूनी सूनी है ये  ।।


भयंकर रातों की यादें है ये  ।

अद्भुत नासो की प्यादे हैं ये ।। 


नए  नए ठहराव  ठहर  में  ।

नए  नए  गांव  शहर  में  ।।


अज्ञातवास सभाओं  में  ।

शीतल मन्द हवाओं  में  ।।


अब  तो  मुझे  वनवास हुआ। 

नींदों में ख़्वाबों का आभास हुआ।। 


बिरहों  से  शाबाशी  मिला  ।

बीहड़ों  से शाबाशी  मिला  ।।


बिरहों के बीहड़ों में जंगलों में ,

बीते  हुए  कितने  यादें  आए ।


नींदों  के अमंगल  मरुभूमि  से, 

निकले हुए कितने फरियाद आए।। 


बीते  हुए  कितने  अपने  आए  ।

सोए  हुए  कितने  सपने  आए  ।।


छुपे  हुए  कितने  कल्पनाएं आए। 

रोते  हुए  कितने   अपने     आए।। 


नींदों का अमंगल मरुभूमि है ये  ।

विरह का जंगल सूनी सूनी है ये  ।।


भयंकर रातों की यादें है ये  ।

अदभुत त्रास की प्यासे है ये ।।


स्वरचित एवं मौलिक

मनोज शाह 'मानस'

manoj22shah@gmail.com