आओ तेल निकालें

‘सुनो एक छोटी सी खाद्य तेल कंपनी की दुकान खोल लो।‘यह बात कोई और कहता तो मैं हल्के में ले लेता। लेकिन यह बात किसी और ने नहीं खुद मेरे चाचा जी ने कही। वह भी सरकारी। ऊपर से अनुभवी। पशु चिकित्सक अधिकारी हैं। उनके ठप्पे के बिना एक भी मवेशी इधर से उधर नहीं हो पाता। ठप्पों के दम पर उन्होंने कोठी पर कोठी खड़ी कर दी है। अंगुलियों में फंसे मोटे-मोटे सोने के छल्लों वाली अंगुलियों से मेज पर सहकारिता संगीत बजाते हुए आगे कहने लगे – ‘उससे होगा यह कि मैं मृत मवेशियों की सड़ी गली लाशें मुफ्त में उपलब्ध करवा दिया करूँगा। 

जब कभी तेल के दाम बढ़ते रहेंगे, हम उनका तेल निकालकर आकर्षक स्टिकर वाले डिब्बे में भरकर बेच दिया करेंगे।‘ मैं कुछ गम्भीर हुआ और बात को वैयक्तिक धरातल से ऊपर खींचकर राष्ट्रीय धरातल पर ले गया, ‘इससे तो देश में स्वास्थ्य का स्तर बहुत गिर जाएगा। लोग बीमार पड़ सकते हैं‘ वे मुझसे अधिक गम्भीर हो गये। स्वास्थ्य अधिकारी से खिसक कर नेताई मुद्रा में बोले, “स्वास्थ्य स्तर गिरना बुरा है या मरना?

मैंने उनके प्रश्न पर विचार किया और बोला, "मरना बुरा है। स्वास्थ्य बिगड़ने से एक बार के लिए ठीक हो सकते हैं, लेकिन मरने पर वह संभावना भी नहीं रहती।" “तो ठीक है," उन्होंने प्रसन्न होकर कहा, “मात्र स्वास्थ्य का स्तर गिरेगा, मरेंगे तो नहीं न। यही तो देश का निर्माण है। देश का मतलब आर्थिक स्थिति से है। लोग बीमार पड़ेंगे तो अस्पताल जायेंगे। वहाँ से मेडिकल स्टोर। अस्पताल में डॉक्टर, नर्स, कंपाउंडर और उससे जुड़े कर्मचारियों के हाथों में रुपया-पैसा खिलेगा। मेडिकल से दवा कंपनियों में काम करने वाले असंख्य कर्मचारियों का धंधा जोरों से चलेगा। 

बाजार में रुपया-पैसा नाचने-झूमने लगेगा। देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होने लगेगी।" मैं उनके उपाय से बहुत प्रभावित हुआ। मुझे लगा, बात बहुत सही है। देश के विकास यज्ञ में ऐसे खाद्य तेलों का उत्पादन बहुत जरूरी है। तेल अच्छा होगा तो लोग बीमार कैसे पड़ेंगे? बीमार नहीं पड़ेंगे तो अस्पताल, मेडिकल, दवा कंपनी कैसे जियेंगे। स्वस्थ रखने के लिए कोई न कोई मिल जाएगा। बीमार करने वाले भी तो होने चाहिए। लेकिन मैंने एक और शंका व्यक्त की, “कि आजकल लोग बड़े हेल्थ कांशियस हो गए हैं। हर चीज के बारे में गूगल करते हैं और तब जाकर खरीदने की सोचते हैं। तब ऐसे में यह तेल कंपनी खोलकर क्या लाभ होगा?

‘तुम निरा मूरख हो। बच्चों जैसी बाते करते तुम्हें शर्म नहीं आती। अमा यार गूगल कुछ भी अपने से थोड़ी न बताता है। हम जो वहाँ अपलोड करते हैं वही तो वह हमें बदले में देता है। बाबा आदम के जमाने में आँखों में धूल झोंकना मुश्किल काम था, जबकि गूगल के जमाने में आँखें खुद धूल झोंकवाने के लिए उतावली रहती हैं। आजकल की पीढ़ी बड़ो का आदर करना भले न जानती हो लेकिन सोशल मीडिया का यूज करना भली भांति जानती है। वैसे भी देश में बेरोजगारों की कमी थोड़े न है। 

लगा दो तीन-चार छोरों को ए-वन क्वालिटी ऑयल की ब्रांडिंग में। देखो कैसे लोग भेड़-बकरियों की तरह खरीदने के लिए उतावले होते हैं। दे दो ऑफर तेल पर किसी टूरिस्ट प्लेस की रेल यात्रा फ्री। ऑफर किसी एक को मिलेगा, लेकिन खरीदने वाले होंगे लाखों। बड़े से लाभ में छोटी सी हानि कभी नहीं देखते। मरे का तेल तो कोई भी निकाल सकता है, तारीफ तो उसकी होगी जो जीने वाले लोगों का तेल निकाल सके।‘ अब मैं उन्हीं के बताए नक्शे कदम पर चलकर तेल की कंपनी चला रहा हूँ। 

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त, मो. नं. 73 8657 8657