नेह का बिछौना

कहते हैं जिन्हें याद करो,वे सपनों में नज़र आते हैं।

माँ,पर तुम्हें देखने को नैन मेरे तरस जाते हैं।

यदि होता है पुनर्जन्म तो आकर मुझे समझा दो न,

यदि ईश चरणों में लीन हो तो आकर मुझे बतला दो न।

ऐसे कैसे तुम चली गयी हर रोज़ बात करती थी,

अपनी बेटी को बिन कॉल किये न रहती थी,

अब क्या हो गया तुम्हें,जो सपनों में भी न आती हो?

अपनी मीठी बोली माँ अब क्यों नहीं सुनाती हो?

सिर्फ और सिर्फ तुमपर ही लिख रही,

वे सारी बातें जो रह गई थी अनकही।

लोग मुझे समझाते हैं ढाढस बंधाते हैं,

कहते हैं मैं तो स्वयं बच्चों की माँ हूँ,

सोचूँ उनका जिनकी माँ बचपन में चली जाती हैं,

अनाथ हो जाते बच्चे वे लौट कर न आती हैं।

कैसे उन्हें मैं समझाऊँ मैं भी अनाथ ही हो गयी हूँ,

भले ही बच्ची नहीं मैं,पर तुम बिन खो गयी हूँ।

दुनियां के इस मेले में आँचल का इक कोना दे दो,

माँ, सपनों में ही सही मुझे नेह का बिछौना दे दो।


                     रीमा सिन्हा

                 लखनऊ-उत्तर प्रदेश