ज़िन्दगी के केनवास पर

ज़िन्दगी के केनवास पर

बचपन ने खिंची थी जो

आड़ी तिरछी लकीरें

उसे यौवन ने कर सीधी

खिंची नये सपनों की लकीरें

कुछ ख्वाब हुए पूरे

कुछ ख्वाब रहे अधूरे

ठीक उस कैनवस की

तरह जिस पर कभी बन

जाता है चित्र खूबसूरत सा

कुछ रह जाते कोरे के कोरे

ज़िन्दगी के केनवास पर

जितना हाथ होता 

हाथों की लकीरों का

उतना ही तकदीर, नियति,

 समय की लकीरों का भी

जिसके अनुरूप हम ढलते 

रहते हैं अलग अलग साँचे में

ज़िन्दगी के केनवास पर

बचपन से युवा फिर प्रौढ़ फिर

अधेड़

न जाने कितनी लकीरें

न जाने कितने ही चित्र

बनते , टूटते,संवरते, बिखरते

रहे

कभी खुशी हँसी की फुहार बनके

कभी गम आँसूं की गुहार बनके

ज़िन्दगी के केनवास पर

हर उम्र हर पड़ाव हर मौसम

में बिखरे रंग न जाने कितने

कुछ अपने से कुछ पराये से

बचपन की खिंची 

आड़ी तिरछी लकीरें

कब बन जाती हैं उम्र के 

आखरी पड़ाव की आड़ी तिरछी लकीरें

पता ही नहीं चलता

और यूँ ज़िन्दगी चलती रहती है

ज़िन्दगी के केनवास पर 

भरते रंग अलग अलग।।

.....मीनाक्षी सुकुमारन

        नोएडा