तुम ही कर सकती हो


हे स्त्री!

व्यवस्था घर की हो

या जीवन की

तुम्हीं सुधार सकती हो,

बिगाड़ भी सकती हो तुम्हीं,


तुममें है शक्ति

सब कुछ संवारने की और

तहस-नहस करने की भी,


तुम चाहो तो चमका दो

क्षितिज में इक नया सूरज

या फिर कर दो दफन

उम्मीद नयी उभरती हुई,


तुम्हारा मन हो तो

जीवन गुलज़ार कर दो

और अगर न हो तो

जीना बेकार कर दो


चाहें हम कुछ भी

फैसला तुम्हारा रहेगा,

हौंसला तुम्हारा रहेगा,

सहयोग तुम्हारा रहेगा


सही राह चलाने को

या फिर भटकाने को,

तय सिर्फ तुम्हें करना है

कि क्या करोगी तुम ?


      जितेन्द्र 'कबीर'