ग़बन करके कहते हैं आमद नहीं होती

झूठे और फरेबियों की कोई हद नहीं होती,

ग़बन करके वो कहते हैं कोई आमद नहीं होती।


ज़मीर बेच देते हैं चंद रुपयों की ख़ातिर   वो,

देश इनका नहीं होता कोई सरहद नहीं होती।


औरों का हक़ मारकर बन जाते हैं वो अमीर,

गिरा देते हैं ज़मीर को कोई क़द नहीं होती।


खेल यह नापाक कुछ किस्मत का है साकी,

वरना पापियों के सर स्वर्ण गुम्बद नहीं होती।


मिलते हैं वो सबसे यूँ ही हँस मुस्कुराकर,

बुराई रखते सीने में अच्छाई मक़सद नहीं होती।


                    रीमा सिन्हा(लखनऊ)