नरसंहार के अलावा कोई दूसरा मार्ग नहीं ?

‘दो दिन की जिन्दगी है हँस-खेल कर जीना चाहिए । न किसी से बैर, न किसी से द्वेष, न कोई शिकवा-गिला करो ।’ इस बात को प्रायः हर घर में अपने बच्चों तथा अपनों के साथ कभी-न-कभी सभी सांझा करते हैं परन्तु वास्तविकता इसके विपरीत है । जैसे-जैसे हम जीवन के पराव में आगे बढ़ते जाते हैं वैसे-वैसे हिंसा, प्रतिशोध, विद्रोह, बदले के दलदल में फंसते चले जाते हैं । जीवन के इस कटु सत्य से सभी बाक़िफ हैं कि हम सभी को देर-सबेर इस संसार से खाली हाथ जाना है । रावन की सोने की लंका धरी की धरी रह गयी । 

हिटलर पूरा विश्व जीत कर भी खाली हाथ चला गया परन्तु जब तक ये जीते रहे युद्ध-ही-युद्ध करते रहे । जीतने की जुनून उनके सिर पर ऐसे सवार थी कि वे अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझते थे । चाहे वह महाभारत का युद्ध हो, भारत-पाकिस्तान का बंटवारा या फिर कोई भी जंग दो सत्ताओं को लड़ाई में साधारणजन को ही अपना सर्वस्व बलिदान करना पड़ता है । आज रूस और युक्रेन की लड़ाई में जिन लोगों की मृत्यु हुई / हो रही है क्या उन लोगों के परिवार के बारे में कभी यह सत्ताधारी सोचते हैं ? नहीं । 

(किसी के जाने के बाद कोई भी मुवाबजा किसी व्यक्ति की कमी पूरी नहीं कर सकती ।)  इस लड़ाई में अंततः दो में से एक राष्ट्र विजयी होगा परन्तु हार उस हर एक माँ-बाप की होगी जो अपनी संतान खोये हैं, हार उस हर एक बहन, पत्नी, बच्चों की होगी जो अपने भाई, पति और माँ-बाप खोये हैं । इतिहास गवाह है युद्ध में बस किसी एक की जीत होती है और बाकी सभी की हार होती है । और कभी-कभी जीतने वाला भी मातम मनाता है क्योंकि खण्डरों में राज करना भी क्या कोई पौरूष की बात है ? 

महाभारत का युद्ध द्रौपदी के अपमान के बदले हुआ था परन्तु द्रौपदी का कलेजा भी चूर-चूर हो गया, उसका कलेजा मुंह तक आ गया जब उसने अपने किए गए प्रण के अनुसार दुष्शासन के छाती के रक्त से अपना केश धोया । गुस्सा, अहंकार, प्रतिष्ठ, सम्मान, गर्व, अनुशासन सब अपनी जगह ठीक है परन्तु उस कुरूक्षेत्र की धरती से आज भी तड़पते हुए हृदय की चीख, कराहती हुई स्त्रियों की वेदना, सिसकते हुए आत्माओं की पुकार चीख-चीख कर बस एक ही सवाल कर रही है – हमारी क्या गलती थी ? हमे किस बात की सजा मिली ?  

क्योंकि वास्तविकता यही है मौत मरने वाले के लिए नहीं उनके पीछे जीने वालों के लिए दुःखदायी होती है । छिन्न-भिन्न लाशो के अम्बारों में रोती-बिलखती स्त्रियों, बच्चों, बूढ़े माँ-बाप के भीड़ में, मौत के भयावह और गम के सन्नाटे में कोई भी विजेता अपनी जीत का जश्न कैसे मना सकता हैं ? क्या इस युद्ध का नरसंहार के अलावा कोई दूसरा मार्ग नहीं हो सकता था / है ? क्या युद्ध करना बाध्यतामूलक था /है ? 

स्वयं विचार कीजिए । आज बार-बार रूस और यूक्रेन के बीच शांति प्रस्ताव के लिए बैठक हो रही है परन्तु बात नहीं बन पा रही है । अंततः कुछ अपनी-कुछ सामने वाले की बात को मानने-मनाने के बात स्थिति में सुधार आयेगा । युद्ध भी समाप्त हो जायेगा परन्तु इन देशों को युद्ध में हुए नुकसान की भरपायी करने में सालों लग जायेगें । किसी भी देश में जब युद्ध होता है तो वहाँ की दोनों पक्षों की धन-जन की हानी की पूरती करने में कई साल लग जाते हैं, देश कई साल पीछे चला जाता है । धन की पूरती तो आज नहीं तो कल हो ही जाती है परन्तु जन की.....।

डॉ. चम्पा प्रिया, बैंगालुरू 7002417854