"युद्ध आख़िर क्यूँ"

"हरेक महल से कहो के झोपड़ियों में दिए जलाये, छोटो और बड़ो में अब कोई फर्क नहीं रह जाये,

इस धरती पर हो प्यार का घर घर उजियारा, इंसान का हो इंसान से हो भाईचारा यही संदेश हमारा"

इतनी समझ तो हर इंसान में होती है की अगर पड़ोस में कोई सरफ़िरा रहता है तो आपको उनको ऊँगली करने से बचना चाहिए। युक्रेन ने ऐसे ही अकडू राजा से पंगा ले लिया है। जबकि सियासती सूबों की सबसे पहले अपने राष्ट्र के प्रति और देश के नागरिकों के प्रति जिम्मेदारी होनी चाहिए। 

युद्ध का आगाज़ करने से पहले अपनी क्षमता नापनी चाहिए। सामने कौनसा देश है, और उसकी ताकत कितनी है उसका मुआयना करने के बाद सबसे पहले शांति समझौते से हर मुद्दा निपटाने की कोशिश करनी चाहिए। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद लगभग हर राष्ट्रध्यक्षों ने युद्ध से दूर रहना ही मुनासिब समझा। हमारी सहानभूति युक्रेन के लोगों के प्रति होनी चाहिए। युद्ध में सबसे ज्यादा कष्ट उठाने वाले लोगों ने युद्ध कभी नहीं चाहा। बहुत सारे रूसी लोग पूतिन के फैसले के ख़िलाफ़ है, क्यूँकि राजनीति राष्ट्र का संचालन है। न कि मनुष्यता का हनन। 

ज़ेलेन्स्की की हालत आज एक कमज़ोर यौद्धा जैसी है जो शक्तिशाली पहलवान को ललकार तो देता है फिर मात खाने पर खुद को पिड़ित साबित करने पर तुला है। आम इंसानों को परे रखकर युद्ध को सरहद तक सिमित रखना चाहिए। युद्ध की नैतिकता कहती है की सिविलियन पर प्रहार धोखा है, नियमों का उल्लंघन है। ज़ेलेन्स्की अपने देश के नागरिकों को हथियार बांटकर मौत का शिकार बना रहा है। और इसी बात का फ़ायदा उठाते कुछ नागरिक हथियारों का गैर इस्तेमाल कर रहे है। ये तो नागरिकों का सैनिकिकरण हुआ, जो सशस्त्र सेना के सामने पल भर भी नहीं टिक पाएंगे और बेमौत मारे जाएंगे। 

युक्रेन महज़ पश्चिमी राष्ट्रों के हाथों की कठपुतली है जिसके बहकावे में आकर अपने देश के नागरिकों को युद्ध की आग में झोंक दिया है। 

बात महज़ इतनी है यूक्रेन को लगता है कि वह यूरोपीय संघ और नाटो का हिस्सा बनकर अपने देश की अर्थव्यवस्था को सुधार सकता है। वहीं, रूस को डर है कि अगर यूक्रेन नाटो का सदस्य बन गया तो दुश्मन देशों की पहुंच उसकी सीमा तक हो जाएगी। रूस चाहता है कि यूक्रेन न केवल नेटो बल्कि यूरोपीय संघ और यूरोप की अन्य संस्थाओं के साथ भी न जुड़े। नाटो को लेकर रूस की दो मांगे है। पहली यह कि यूक्रेन नाटो का सदस्य न बने और दूसरी कि नाटो की सेनाएं 1997 के पहले की तरह की स्थिति में लौट जाएं। दो देशों के इस वैमनस्य से मासूम प्रजा का क्या लेना-देना 

कुछ लोग युक्रेनी राष्ट्रवाद को विक्टिम समझकर जयघोष कर रहे है, और ज़ेलेन्स्की को हीरो बता रहे है। बिना ये जानें की युद्ध के मायने क्या है, जो गलत है। न पूतिन के कारनामों को इसलिए शैय देनी चाहिए की वो भारत का दोस्त है। ज़ेलेन्स्की और पूतिन दोनों युद्ध के लिए ज़िम्मेदार है, पिड़ीत तो दर असल प्रजा है जिनको राजनैतिक रुप से प्रताड़ित किया गया है। 

ज़ेलेन्स्की ने किस बिना पर युद्ध लड़ा? रूस के मुकाबले तुलना करें तो किसी भी एंगल से युक्रेन सशक्त नहीं। न उसके पास परमाणु हथियार है, न नाटो न यूई का सदस्य है जो उसके बचाव में कोई आएगा। और सबसे अहम् बात ये की क्या युक्रेन उस स्थिति में है की रूस के साथ जंग में जितने की ताकत रखता है? क्या सोचकर युक्रेन की प्रजा को युद्ध का मार झेलने के लिए झोंक दिया। 

कितने लोग बेघर हुए, कितनों के सर से बाप का साया उठ गया, कितने लोग अपनों से बिछड़ गए, दूर देश से युक्रेन पढ़ने के लिए गए छात्रों का भविष्य क्या? कौन भरपाई करेगा इन लोगों की कमी। युद्ध का अंजाम युद्ध करवाने वाले नहीं भुगतते, बलि का बकरा बनती है आम जनता जो शांति से ज़िंदगी जीना चाहती है। विश्व युद्ध की कगार पर खड़ा खेल ख़त्म हो। न्युक्लीअर की दहशत से डरी दुनिया का यही सवाल है, 

(युद्ध आख़िर क्यूँ)

भावना ठाकर 'भावु' (बेंगलोर,कर्नाटक)