वक़्त कहाँ किसी से उलझने का

दुनियादारी की उलझनों में वक़्त कहाँ किसी से उलझने का 

ऐ दिल तू ही तो है ज़िम्मेदार अपने दिल के तानों बानों को ..........


भाग रहा था कल तक जो दीवानों के जैसे 

आज उसी की हालत हुई समंदर के साहिल जैसी 

न पार लगने की उम्मीदें न हौसला टूटकर बिखर जाने का .......


बियाबान जंगल में क्यों खोजे पानी मनवा 

पत्थर की नगरी में हाल हुआ सबका पत्थर जैसा 

चलता जा कहीं तो मिलेगी #वर्षा तेरी मंजिल तुझको 

चूड़ियों में अब सार कहाँ दिल के अफसानों का .......


वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़