टूटें कितनें चित्र-विचित्र!

टूटें कितनें चित्र-विचित्र!

मानष के पट से गिरकर।

उभरी कई सुनहरी लकीरें

चरित्रों की बुनियाद वाली।


किसी आँख की कोर तले से

बह निकली धार किनारें छूटे।

किसी धार में खंजर थी तीखी

किसी धार में ममता की लहरें।


टूटनें के सुख से वंचित लोग

कोरी बात लिए जेब में फिरते।

टूटनें के सुख से अनजान 

क्या! जान सकेंगे जीवन तरल।


निःश्वास शब्दों की अमरता 

छिपी बेबसी के किसी कोने।

मरेंगे भाव वस्तुरूप बन के

वस्तुधर्म नित्य भाव विरोध।


सुख के हौंसले जड़ है जीवन के

दुःख सींचते नित्य जगत को

मौन होकर ही घटना घटती

परिणाम चीखें नित्यप्रति लाती।


परिचय  - ज्ञानीचोर

मु.पो. रघुनाथगढ़ सीकर,राज.