वफ़ा

निकहत-ए-वफ़ा से सहरा गुलज़ार होता है,

ख़्याल-ए-महबूब से मुब्तला न आज़ार होता है।


जाँ-रुबा होता है सुकून-ए-दिल होता है,

रूठी फ़िज़ा को जो हँसाये वो बहार होता है।


नज़र असर करती है मोहब्बत में यक़ीनन,

शब-ओ-रोज़ जो बढ़ता जाये वो ख़ुमार होता है।


बेचैनी में भी सुकून-ए-क़ल्ब है ढूँढता फिरता,

लाइलाज़ इस मर्ज़ में दवा बेकार होता है।


तस्लीम-ओ-रज़ा की परवाह किसे अब रीमा,

इश्क़ इकतरफ़ा भी ला-फ़ना गुलज़ार होता है।


                 रीमा सिन्हा

            लखनऊ (उत्तर प्रदेश)