जनमत के चर्चा की प्रवृत्ति

वर्तमान राजनीतिक चुनावी परिवेश में जनमत एक ऐसी विषयवस्तु है जिसके चारों ओर से आने वाला हवा का झोंका छेड़ देता है लेकिन इससे जो स्वर उत्पन्न होते हैं वह हमेशा  संगीतात्मक नहीं होते। जनमत का स्वरूप सदैव कल्याणकारी होना चाहिए। जनमत का हर रूप या विचार जनमत नहीं हुआ करते , अफवाहों को भी हम जनमत नहीं कह सकते , जनमत के लिए आवश्यक हो कि वह जन कल्याणकारी व विवेकशील हो। जनमत निर्माण के मुख्य साधनों में प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका होती परंतु स्वच्छ जनमत के निर्माण में सर्वाधिक बाधा इन्हीं की रही है। वर्तमान समय में "पीत पत्रकारिता" के दौर से गुजरती हुई मीडिया पक्षपातपूर्ण झूठी खबरे फैलाकर जनमानस को दिग्भ्रमित कर रही हैं। पीत पत्रकारिता ने ही अशिक्षा, गरीबी, भयंकर भुखमरी, भ्रष्टाचार जैसे ज्वलंत मुद्दों को दरकिनार करके विषमतायुक्त अभिव्यक्ति की ओर अग्रसर है। प्रिंट मीडिया इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का नैतिक दायित्व बनता है कि शुद्ध जनमत के निर्माण में अपने कर्तव्यों का जिम्मेदारियों के साथ निर्वहन करें। वैसे तो शुद्ध जनमत के निर्माण के लिए लोगों में चर्चा की प्रवृत्ति होना बहुत ही आवश्यक है क्योंकि चर्चा के प्रवृति से ही अच्छे राजनीतिक गुण जनमानस के लिए निकलते हैं। समाचार पत्रों को जनमत निर्माण करने का प्रमुख धर्म ग्रंथ कहा जाता है समाचार पत्र ही जनमत की प्राण वायु होते हैं। इसलिए पत्रकारिता का प्रमुख कर्तव्य शुद्ध जनमत का निर्माण करना है। पाश्चात्य विचारक डेविड ह्यूम ने बहुत पहले ही कहा था "कोई भी शासन प्रणाली वह कितनी भी दूषित क्यों ना हो वह अपनी शक्ति के लिए जनमत पर निर्भर रहती है।" राजनीति का इतिहास साक्षी रहा है जनमत की अवहेलना करके आज तक की थी पर कोई शासन नहीं कर पाया। जनमत के निर्माण में प्रथा परंपराएं एवं पर्यावरण की भूमिका अत्यंत ही महत्वपूर्ण होती है। जनमत निर्माण के बाद वोटो को गिनना चाहिए ना कि तौलना चाहिए। सहभागिता मूलक लोकतंत्र में तो समाज के अंतिम व्यक्ति को भी सत्ता में भागीदारी मिलती है परंतु आधुनिक लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को जिम्मेदारी तो मिल जाती है परंतु सत्ता में भागीदारी नहीं प्राप्त होती। जनमत निर्माण में असली खिलाड़ी कौन है और असली अनाड़ी कौन है यह कहना अनुपयुक्त होगा क्या मीडिया सिर्फ रेफरी मात्र है। कुछ राजनीति के महत्वपूर्ण मुद्दों पर जनमत संग्रह ,लोक निर्णय, उपक्रम, प्रत्यावर्तन का भी सहारा लेना चाहिए इन शब्दावलीयों का प्रयोग करना है यहां पर करना सर्वथा उचित है क्योंकि प्रतिनिधि प्रजातंत्र में अच्छे सरकार के निर्माण के लिए अच्छी बात होगी। नियमों का नियमन स्वतंत्रता पूर्वक होगा क्योंकि जनमत ही जनता का जनक और शिशु दोनों होता है।

स्वतंत्र स्तंभकार 

सत्य प्रकाश सिंह 

प्रयागराज उत्तर प्रदेश