"मृत्यु के बाद का सत्य"

यमुना के किनारे एक महान संत, पहुंचे हुए बाबा थे।जो जल समाधि की तैयारी कर रहे थे। उनके सभी शिष्य बड़े उदास व दुःखी थे।जल समाधि लेने से कुछ समय पूर्व संत ने अपने सभी शिष्यों को बुलाकर अपने पास बैठाया और गूढ़ रहस्य से पर्दा उठाते हुए, प्रसन्नता से अपने शिष्यों को प्रवचन देने लगे।

महान् संत बोले---

ये जीवन क्या है? प्रत्येक प्राणी अपने विचारों से, अपने कर्मों से, जीवन के भोगे हुए सफर से पहचाना जाता है। और भी असंख्य लोग जो अपने करीबी हैं, तथा राह चलते मुसाफिर हैं, उनके जीवन को भी देखा व सुना है। कहने की बात यह है कि, मनुष्य जीवन के विषय में बहुत कुछ जानता है, लेकिन मृत्यु के परे का सत्य तो विरले ही प्राणी समझते हैं,जो समझते हैं, उन्हें मृत्यु का भय नहीं होता।

मृत्यु के बाद का सत्य क्या है?

बाबा के सभी शिष्य बड़े ध्यान से सुन रहे थे, शिष्यों की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी। 

(•) ये ही जीव है यानी आत्मा है।

सब कुछ इसी का खेल है। आत्मा ने ही मन को पैदा किया है, और मन के ही वशीभूत आत्मा हो गई। अब जिंदगी के खेल का रचयिता"मन"हो गया। जो आत्मा से भी परे है, लेकिन आत्मा भी कम नहीं थी, यदि मन ने उसे जंजीरों में बांध दिया, और मनमानी करने लगा।तब आत्मा ने फिर सोचा कि, मुझे भी अपनी शक्ति का अहसास कराना होगा। फिर आत्मा ने मनुष्य के द्वारा किए गए हर कर्म को अपने वहीं खाते (हार्ड डिस्क) में नोट करना शुरू कर दिया। फिर वही आत्मा इस मन को इसके कर्मों के अनुसार---

कभी दुखी करती है, कभी सुखी करती है, कभी चिंतित, उदास करती है, कभी इसे रुलाती है, कभी इसे हँसाती है। आत्मा बड़ी दिव्य शक्ति है,इसको मनुष्य समझ नहीं पाया।

कभी यह मन पर भारी पड़ती है, तो कभी मन इस पर भारी पड़ता है।मन और आत्मा के अनुसार मनुष्य इस दुनिया में नाना भांति के कर्म करता है।

शरीर (तन) तो इन दोनों का हथियार है। जैसा आत्मा और मन चाहतें हैं वैसा ही काम इस शरीर से करवाते हैं।इन हाथों को कुछ पता नहीं होता कि वह किसी को प्यार कर रहे हैं या किसी से मारपीट कर रहे हैं।

पैरों को पता नहीं होता कि वह सही रास्ते पर चल रहे हैं या गलत रास्ते पर चल रहे हैं। शरीर का प्रत्येक अंग मन के वशीभूत होकर काम करता है।

मृत्यु के परे का सत्य यह है------

जब आत्मा को इस शरीर से परेशानी महसूस होती है, और मन को वह सबक सिखाना चाहती है, तो वह इस शरीर का त्याग कर देती है। शरीर त्यागने के बाद पृथ्वी पर ही स्वच्छंद विचरण करती है। यही पृथ्वी लोक का स्वर्ग है।वह आत्मा तन मन से मुक्त हो जाती है। कर्मों के आधार पर छंटनी होती है, कुछ स्वर्ग में, कुछ नर्क में, और कुछ पृथ्वी लोक में विचरण करती हैं। पृथ्वी लोक में विचरण करने वाली आत्मा, पुनः जन्म लेने के लिए, किसी के गर्भ में प्रवेश करने के लिए, तलाश में भटकती रहती है, इसके भी कर्मों के अनुसार लिस्ट बनती है। हमने किसके साथ क्या कर्म किया, किसी ने हमारे साथ क्या किया, अच्छा या बुरा,उसी के अनुसार--

उन सभी से पुनः मिलन की तलाश में रहती है। जहां सभी योग बनते दिखते हैं,बस वहीं उसी घर में उसका प्रवेश हो जाता है।बस यही चक्र जीवन और मृत्यु का चलता रहता है।जब तक वह संसार के जाल से मुक्त नहीं हो जाता।

इसलिए कहता हूँ--

मृत्यु से कभी भय नहीं होना चाहिए, जिस तरह जन्म की खुशी मनाई जाती है,उसी तरह मृत शरीर को भी विदा करना चाहिए। प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारा पुनः मिलन हो।

सभी शिष्यों ने महान संत के प्रवचनों को बड़े ध्यान से सुना, और खुशी- खुशी सभी ने महान संत को,जल समाधि के लिए विदा किया।


डॉ.अनीता चौधरी 

मथुरा