अश्रु नहीं बहाते हैं

लोग कहते हैं कि

पुरुष मजबूत होते हैं

अबला नहीं होते वे

अश्रु नहीं बहाते हैं

लेकिन पुरूष भी रोते हैं

जब दिल दुखता है

बहन की विदाई हो तो

छिपकर रोते हैं वे

अश्रु कोई देख न ले

सब से छिपाते हैं

मां को दर्द हो तो

वे अश्रु बहाते हैं

चाहे पत्नी के शब्दों

की पीड़ा हो

जब सह नहीं पाते हैं

अश्रु बहाते हैं

जब जाते हैँ परदेस

कमाने घर छोड़कर

अपनों को याद कर

वे अश्रु बहाते हैँ

होते हैं जब बेटी से दूर

बचपन याद आता है

खेल खिलौने गुड़िया देख

वे अश्रु बहाते हैं

जब जाते हैं परदेस

कमाने घर छोड़कर

अपनों को याद कर

वे अश्रु बहाते हैं

नाम न हो उनका कि

पुरुष अश्रु बहाते हैं

न आए पुरुषत्व आंच

वे छिपकर अश्रु बहाते हैं

लोग कहते हैं कि

पुरुष मजबूत होते हैं

अबला नहीं होते वे

अश्रु नहीं बहाते हैँ

पूनम पाठक "बदायूँ "