"सोच बदलो तभी समाज बदलेगा"

हमारे देश के नागरिकों की सोच धर्मांधता की सीमा लाँघ रही है। लोग हर बात को धार्मिक रंग देकर अशांति फैलाने का कोई मौका नहीं चुकते। खासकर सोशल मीडिया पर धर्म के नाम पर बेमतलब दो अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच वाक् युद्ध होता रहता है। एक तरफ़ कर्नाटक के स्कूल में हिजाब बनाम भगवा स्कार्फ़ का विवाद चल रहा है, तो दूसरी तरफ़ कल लता दीदी के पार्थिव देह को श्रद्धांजलि देने आए शाहरुख़ खान की प्रार्थना पर तू तू, मैं मैं हो रही है। कल छोटा बड़ा हर इंसान अपनी श्रद्धानुसार प्रार्थना करते लता दीदी को श्रद्धांजलि दे रहे थे, शाहरुख़ खान ने भी अपने धर्म, संस्कार और इस्लामिक संस्कृति को मानते हाथ उठाकर इबादत करते श्रद्धांजलि दी, और लता दीदी के पैरों के उपर फूँक मारी जो श्रद्धांजलि का ही एक हिस्सा था। 

इस्लामिक परंपरा के मुताबिक, जब कोई दुआ की जाती है तो उसके लिए दोनों हाथों को उठाकर सीने तक लाना होता है और अल्लाह से मिन्नतें की जाती हैं। ये ठीक वैसे ही है, जैसे किसी के आगे झोली फैलाने की बात कही जाती है, और अल्लाह की चौखट पर अपनी अर्जी  रखी जाती है।

किसी के स्वस्थ होने की दुआ, किसी की नौकरी की दुआ, या किसी आत्मा की शांति के लिए दुआ कुछ भी हो सकती है। शाहरुख खान ने लता दीदी के पार्थिव शरीर के सामने जो किया वो यही था। उन्होंने लता दीदी की आत्मा की शांति के लिए कामना की तो क्या गलत किया? वो उसका धर्म है, आस्था है, दुआ मांगने की विधि है, प्रार्थना का तरीका है। 

महज़ इस्लामिक रीति-रिवाजों का अनुसरण किया ये उनका गुनाह हो गया। हम हिन्दु किसीके जनाज़े पर जाते है तब हाथ जोड़कर अपने ईश्वर से मरने वाले के लिए प्रार्थना ही करेंगे, ना कि हाथ उठाकर कलमा पढ़ते दुआ करेंगे। 

शाहरुख खान और लता मंगेशकर के बीच जो गहरा रिश्ता था, उससे शायद लोग अन्जान हैं। यही वजह है कि लोग शाहरुख को ट्रोल कर रहे है। हकीकत तो ये है कि लता और शाहरुख, एक दूसरे की बहुत कद्र करते थे। कोई इंसान किसीकी मृत्यु को मजाक नहीं बनाता। शाहरुख खान मुस्लिम है इसलिए उनकी इबादत में भी गलती निकालना ही इस ट्रोलिंग का मकसद है तो बहुत गलत बात है। बात यहाँ शाहरुख़ खान की तरफ़दारी की नहीं, बात है किसी भी धर्म को गलत नज़रिये से देखने की। हमारी इसी सोच ने देश को कई हिस्सों में बांटकर रख दिया है। कट्टरवाद अब हद पार कर रहा है। हिन्दु, मुस्लिम एक दूसरे को यूँहीं बात-बात पर ट्रोल करते रहेंगे तो एक दिन धर्मं युद्ध छिड़ जाएगा। क्यूँ हम एक दूसरे के धर्म का आदर सम्मान नहीं कर सकते? आम इंसान को समझना होगा, सियासती लोग वोट बैंक की राजनीति करते रहेंगे करने दीजिए, हमें अपनी सोच को सकारात्मक रखकर किसी भी धर्म का अपमान नहीं करना चाहिए, न किसीकी धार्मिक भावनाओं को आहत करना चाहिए। 

ईश्वर अल्लाह एक है, रुप अलग है प्रार्थना किसी भी विधी से की जाए सच्चे मन से मांगी दुआ उस अर्श तक जाती है, जहाँ ईश्वर अल्लाह आमने-सामने बैठकर नेमतों की बारिश करते है। यूँ सच्चाई जाने बिना हर बात पर किसी धर्म का मजाक उड़ाना धर्म का पतन है। सोच बदलो तभी समाज बदलेगा। 

भावना ठाकर 'भावु' (बेंगुलूरु, कर्नाटक)