मगदल : 'अस मानस मानस चख चाही'

मेरी स्मृति में बनारस कौंधता रहता है क्योंकि भीतर कहीं गहरे तक एक गुदगुदाती फांस की तरह धंसा हुआ है एक दृश्य |  बड़ी खिडकियों के बाहर  बहती गंगा- चांदनी रात, बरसात में हरहराती, घने कोहरे की चादर ओढ़े  या चमकीली पारदर्शी धुप में बहती गंगा | मैं अपने उसी तिमंजिले कमरे में अबतक मानसिक तौर पर कैद हूँ | 

   जयपुर में बनारसी खुमारी की फुर्फुराती सुख की कल्पनातीत अनुभूति के साथ 'देह धरे का धर्म' निभा रहा  हूँ | इसी सनक में कई बार अपनी औकात से बढ़कर कदम उठा लेता हूँ - नतीजन आशा सहित शुभेच्छु  मित्रों की झिडकी भी प्रकारांतर से झेलनी  ही पड़ती है | और  मैं हूँ की अपनी आदत  बाज़ नहीं आता गुरु ! 

     यूँ तो जाड़े में यहाँ पोष बड़ा, गाजर का हलुआ, बाजरे के तमाम व्यंजनों के बावजूद मैं मटर चुडे की बनारसी जाएके वाली खिचड़ी और मगदल के लिए तड़पता रहता हूँ | मटर-चुडा तो मानो ठेल-ठालकर बन भी जाये पर मगदल |

     बनारसी मगदल मूंग की दाल से बनती है | ठंडी के महीनों में खायी जाने वाली मगदल का स्वाद ऐसा  है जो एक  बार खा ले, जीवन पर्यंत नहीं भूलेगा | यह भी संभव है कि  यदि जाड़े में वैकुण्ठ जाने की नौबत आये तो  गंगाजल से से पहले मगदल की इच्छा जाहिर कर दे ! क्योंकि यह मुंह में डालते ही घुल जाती है | मेरे जैसे दिखने के दांत वालों के लिए तो यह अमृत-उपहार सा है | 

   सो, बनारसी जायके वाली जाड़े की अप्रतिम मिठाई मगदल और मलैयो ही है | ओस की बूंदों से  बनने वाली मलैयो  को तो मंगाया नहीं जा सकता | लेकिन मगदल, मंगाने की अंततः ठान ही ली | मैंने अपने रसरंग सखा आनंद वर्धन को फोन पर अपना फरमान सुनाया तो पहले हँसे फिर अनुज मित्र सोमेश्वर यादव से कहने को कहा | पहले तो सोमेश्वर जी ने भिजवाने की दिक्कत बताई लेकिन मेरी जिद्द पर फिर मान भी गए | उन्होंने 'क्षीर-सागर' के अपने सखा केशव उर्फ़ अनूप कुमार यादव से आग्रह किया | मेरे जैसे काशी के पंडों की कूट भाषा में  झंझ की इन चौकड़ मित्रों ने बात रख ली | मैं गदगद हूँ ! 

और अंत में 'अस मानस मानस चख चाही' यानी रसास्वादन के लिए  'मानस' नज़र का होना जरुरी है | ठीक वैसे ही मेरी जैसी चटोरी ग्रहणशील जीभ भी गुरु !!