आपसे राम जी

नाव लेके पुकारत 

हईं राम जी, 

काम सगरो सधी, 

आपसे राम जी।

मन त चंचल हवे 

ऊ टहरबे करी, 

ओह पे अंकुश लगी 

आपसे राम जी।

तन त शोभत रही, 

सबके मोहत रही, 

ओकरा बंधन छुटी, 

आपसे राम जी।

काम जिनगी भर रही,

पीछा न छुटी, 

अब मुक्ति मिली,

आपसे राम जी।

आप कर्ता हईं , 

आप धर्ता हईं, 

अब सब कुछ बनी 

आपसे राम जी।

मन लगावत हईं,

सब मनावत हईं।

सारी पूजी मिली 

आपसे राम जी।

भवसागर फसल नाव 

हमरा के बा, 

हम बतावत हईं 

आपके राम जी।

पार कइसे लगी 

आप जानत हईं, 

आश लागल हव 

आपसे राम जी।

आशिष देईं प्रभु, 

बांह थामी प्रभु, 

गोड़ लागत हईं,

आपके राम जी।


अनुपम चतुर्वेदी सन्त कबीर नगर, उ०प्र०