कौन सा मत किस मत पर भारी...

एक व्यापारी की मौत हो गई। यमदूत उसे परलोक ले गए। परलोक की दो बस्तियों – नरक और स्वर्गलोक का बारी-बारी से एक-एक दिन भ्रमण करवाया गया।  अगले दिन उसे निर्णय लेना था कि उसे कौन सा लोक जाना है। उसकी इच्छा अनुसार उसे नरकलोक ले जाया गया। वहां का दृश्य देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गई। उसने देखा कि नरक के प्रवेश द्वार पर फूहड़ नाला बह रहा था। कल तक जिन मित्रों ने उसे चमक-धमकदार कपड़ों में हंसते हुए स्वागत किया था आज वही गंदे-मलीन कपड़ों में रो-रोकर उसे जाने के लिए कह रहे थे। सिर पर बोझा ढोना, छोटी-सी गलती होने पर नरकलोक के सिपाहियों का पीटना यहां के लिए आम दृश्य लग रहा था। व्यापारी को लगा कि उसके साथ धोखा हुआ है। वह छाती पीट-पीट कर रोने लगा। वह चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था, "अरे भगवान! यह क्या हुआ? मुझे स्वर्ग में रहने का सुअवसर मिला था, लेकिन मैं तो नरकलोक की झूठी तड़क-भड़क के चक्कर में फंस गया। अब मैं क्या करूं? हाय रे मेरी फूटी किस्मत!" उसने नरकलोक के सिपाहियों से पूछा, “यह तो सरासर मेरे साथ धोखा हुआ है। आपने जो नरक कल तक दिखाया था वह तो तडक-भड़कदार थी। सब सुविधाएँ थीं। जबकि आज एक दम विपरीत दृश्य है।” इसके उत्तर में नरकलोक के सिपाहियों ने कहा, “वह तो हम तुम्हें आकर्षित करने के लिए नरकलोक का प्रमोशन कर रहे थे। आजकल बिना प्रमोशन व कैम्पेनिंग के कोई किसी को नहीं चुनता। उसे तो झूठे-झूठे सपने दिखाकर फसाना पड़ता है। तुम उसी प्रमोशन की चकाचौंध में धोखा खा गए।”

मित्रों! वोट हमारा अधिकार है। किंतु वोट देते समय बाहरी तड़क-भड़क, असंभव वादा करनेवालों, रुपयों, वस्तुओं के लालच देनेवालों तथा मुंह में राम बगल में छुरी रखनेवालों को भूलकर भी वोट न दें। वरना हमारी भी हालत व्यापारी की तरह हो जाएगी। फिर हमें भी कहना होगा- " हाय रे मेरी फूटी किस्मत!"

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त, मो. नं. 73 8657 8657