॥ धुंध ॥

ठंडक का जब मौसम आता है

ठंड की सौगात दे जाता     है

रात शबनम चुपके से उतर कर

धरा पर धुंध सजा चली जाती है


जीवन में जब जब धुंध आता है

किस्मत में अंधकार समां जाता है

खुशियाँ रूठ जाती है नसीब से

गम का सेहरा बँध जाता।     है


धुँऑ धुआँ हो जाता है कायनात

कुछ नहीं दिखता है आस पास

दुब पर ओस सुहाना    लगता

सफेद मोती चुपके से  सजता


ठंडक में श्वान कूँ कूँ कर रोता

विद्युत कर दीपक काम ना करता

सब कुछ भीगा भीगा सा हो जाता

आसमान भी ओझल हो   जाता


नदी की धारा चुपके से है बहती

वृक्षों से जल की बूंदें टपकती

हाथ पैर हो जाता है ठंड में सुन्न

जब छा जाती है धरती पे धुँध


लोग दुबक जाते हैं घर के अन्दर

वृक्षों पर जीता है कैसे बन्दर

उनके तन में भी लाल रक्त बहता है

पक्षियों का भी कष्टमय जीवन है


उदय किशोर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार

9546115088