जरा संभल के

जरा संभल कर रहना यारों,

ये दुनियां है इंसानों की।

यहां गिरगिट भी शरमाते हैं,

फितरत देख इंसानों की।


रंग भरी इस दुनियां में,

ये पल पल रंग बदलते हैं।

मौका परस्त कुछ लोग यहां,

नित चेहरे नए बदलते हैं।


जुबां पे शहद सी मीठी वाणी,

पीठ पीछे चुगली करते हैं।

आस्तीन के सांपों  के जैसे,

मौके पर जहर उगलते हैं।


एक हाथ में गुलदस्ता,

दूजे में खंजर रखते हैं।

विश्वासघात करने में ना,

ये जरा भी पीछे हटते हैं।


करते हैं वादे रोज नए,

नित कसमें लाख उठाते हैं।

जब पड़े जरूरत हमें कभी,

तब अपनी पीठ दिखाते हैं।


जब तक इनका काम बने ना,

ये मक्खन हमें लगाते हैं।

मांगे इनसे कभी मदद जो,

तो हमको आंख दिखाते हैं।


करके संतुलन दिल दिमाग का,

बुद्धिमान इंसान परखते हैं।

रखते हैं कदम फूंक फूंक कर,

यूं ही ना भरोसा करते हैं।


सपना 

जनपद-औरैया

उत्तर प्रदेश