दीप वह तुम मत जलाओ

कि लगे आग चमन में, दीप वह तुम मत जलाओ।

पैदा हो नफ़रत दिलों में, राग वह तुम मत सुनाओ।।

कि लगे आग चमन में--------------------------------।।


बनते है बामुश्किल से, यहाँ ये रिश्ते किसी से।

और टूट जाते हैं फिर ये, हमारी ही गलती से।।

टूटे रिश्ता किसी से, राह वह तुम मत दिखाओ।

कि लगे आग चमन में------------------------------।।


बेवजह यहाँ बुराई, किसी की तुम मत करो।

आँसुओं से तुम दामन, किसी का मत भरो।।

उजड़े घर यहाँ किसी का, ख्वाब वह तुम मत बनाओ।

कि लगे आग चमन में ---------------------------------।।


होते हैं सपने मुकम्मल, किसी के मुश्किल से ।

किश्ती पहुंचती है साहिल पे, किसी मुश्किल से।।

चुभे नश्तर कदमों में, पथ वह तुम मत बनाओ।

कि लगे आग चमन में --------------------------।।


रचनाकार एवं लेखक-

गुरुदीन वर्मा उर्फ जी. आज़ाद

तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)