हाँ, मैं संकीर्ण हूँ

हाँ, मैं सकीर्ण हूँ,

विस्तृत नहीं बन सकती।

मेरे लघु वृत की परिधि में,

थोड़े से हैं मित्र सखा,

सीमित है दुनियाँ मेरी,

संतुष्ट है हृदय बड़ा।

लेखनी का दायरा भी

घूमता है निज मन पर,

नहीं लिख सकती 

औरों के मन का,

बावला मन है मेरा।

जानती हूँ मैं ये बात

आज की दुनियां में,

ज़रूरी है विस्तृत होना,

हर तरफ रिश्ता रखना,

दिल से किसी का न होना।

पर क्या करूँ मजबूर हूँ,

स्वयं में बदलाव से दूर हूँ।

सीमित के सीमांत तक

बस मुझको है पहुँचना।

नहीं चाहिये शिखर,

तल के गहन गह्वर को

बस है मापना।

       रीमा सिन्हा

  लखनऊ-उत्तर प्रदेश