जीवन कैसा हो

 हमने न जाने कितनी किताबें अब तक पढ़ी और कितनी डिग्रियां प्राप्त कर लीं ,परंतु अभी भी कितनी ऐसी बातें हैं जो हमें नहीं पता ऐसा क्यों ??

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, 

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।…

बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पर पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके ,परंतु यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।मुझे लगता है कि हमने संवेदना, प्रेमऔर करुणा की भाषा को पूरी तरह से नहीं समझा या फिर हम खुश हैं कि हमारा स्वयं का जीवन संतुष्ट है। 

हम पर्याप्त धन कमाते हैं जिससे हम अपनी "जरूरत" नहीं "इच्छाएं"पूरी करते हैं, क्योंकि जरूरत और इच्छा यह दोनों शब्द अपने आप में पर्याप्त अंतर लिए हुए हैं ।जरूरत इंसान का कपड़ा,भोजन,आवास ही हैं। प्रकृति ने हमें हवा ,जल मुफ्त में ही दे दिया क्योंकि उसे पता था कि जब ऑक्सीजन बिकने लगेगा तो जीवन पैसे के अभाव में बिखर जायेगा। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण कोरोना काल में देखा भी गया था!

 इच्छाएं हमारी असीम है जो पूरी नहीं होती चाहे आखरी सांसे क्यों ना चले लेकिन हमें जगना होगा और इन इच्छाओं से स्वयं को मुक्त करना होगा।

 "यह जीवन कितना क्षणभंगुर 

हम फिर भी शोर मचाते हैं, 

अंबर का तारा भी टूटता 

हम भ्रम तोड़ ना पाते हैं।"

ऐसा भी देखा गया है कि इंसान के ऊपर इच्छाएं इतनी अधिक मजबूत पकड़ बना लेती हैं, कि फिर वह अपने वजूद को समझ नहीं पाता और उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य यदि वह बहुत ही कर्तव्य पूर्ण पद पर है और उस कर्तव्य के निर्वहन में उससे चूक हो जाती है तो ना जाने कितनी जिंदगिया तबाह हो जाती हैं।

 सरकार की बड़ी से बड़ी योजनाएं आती हैं परंतु उसका प्रत्यक्षीकरण बहुत ही कम देखा जाता है ,ऐसा क्यों? सत्य व कर्तव्य का अभाव इंसान को इंसान नहीं रहने देता ।सभी को लगता है कि वह शाश्वत है जीवन समाप्त नहीं होगा लेकिन जिस दिन मृत्यु आती है उस दिन वह कुछ नही कर सकता।

 "धर्मवीर भारती ने 'ठेले पर हिमालय' देखा था,परंतु मैंने ठेले पर लाशें देखी हैं।"-यह वाक्य अपने आप में बहुत कुछ कहता है। कर्म कांड पर न जाने कितने खर्चे हम करते हैं लेकिन किसी जरूरतमंद के पास अगर वही खर्चे हम देते तो हमारा परलोक तो पता नहीं सुधरेगा की नहीं उसका इहलोक जरूर सुधर जाता ।यह वसुधा ही कुटुंब है और इस बसुधा पर रहने वाला प्रत्येक हमारा बंधु है।

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।

 उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।

यह अपना है और यह दूसरे का है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों की तो (सम्पूर्ण) धरती ही कुटुंब है।

वास्तविक अर्थों में जिसे यह ज्ञात हो गया कि यह धरती ही कुटुंब है और जीवन क्षणभंगुर है तब -

'कोई कबीर जाग जाता है, 

कहीं मीरा नाच उठाती है,

कोई राज त्याग बन में चला जाता है,

कोई धर्म की रक्षा के लिए अनेकों लीलाएं रचाता है, और कोई विश्व धर्म संसद में हुंकार लगाता है।।

अंजनी द्विवेदी 

देवरिया ,उत्तर प्रदेश