हार मानकर कभी न रूकना

हार मानकर कभी न रुकना,

चलना बहुत जरूरी है।

चलते रहने से ही होती,

मन की आशा पूरी है।..

दिनकर भी देखो प्राची से,

बात यही तो कहता है।

उदय हुए ही तिमिर गहनतम,

दूर क्षितिज से रहता है।।

लक्ष्य साध चलने से ऊषा,

तब होती सिंदूरी है...

चलते रहने से ही होती,

मन की आशा पूरी है

बाधाएँ जीवन में आएँ,

सदा निडर ही रहना है।

सुख-दुख में स्थिर सम रह कर,

जैसा जो हो सहना है।।

तब मंजिल मिलने में रहती,

कुछ पल की ही दूरी है...

चलते रहने से ही होती,

मन की आशा पूरी है..

ज्ञान सभी गुरुजन देते हैं,

उनकी बातें सभी सुनें।

सुनना मात्र नहीं जीवन में,

उन्हें बंधु हम नित्य गुनें।।

निज संस्कृति की जिज्ञासा भी,

रखना बहुत  जरूरी है..

चलते रहने से ही होती,

मन की आशा पूरी है..


वीनू शर्मा,

जयपुर राजस्थान